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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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है। अपने कार्योंसे आप अनभिज्ञ है इस कारण इसको तू दूसरेका लेख बताता है। तथा अज्ञानसे दूसरेका किया और लिखा हुआ जानता है।

यथा—उसी अंग्रेजी पुस्तकमें एक पादरीकी कहानी लिखी है। यह बात प्रसिद्ध थी, कि, वह पादरी सोंते सोंते बड़े बड़े आश्चर्य कौतुक किया करता था। एक दिवस गिरजाघरमें एक मुरदा स्त्री आई। उसके लिये यह पादरी प्रार्थना करने गया। वह पादरी प्लेटफार्म पर खड़ा होकर प्रार्थना करने लगा। प्रार्थना कर चुकनेके बाद उस स्त्रीको कब्रमें गाड़ने ले चले। उसने देखा कि उस स्त्रीके हाथमें एक अंगूठी थी। यह अंगूठी उस मुरदेके किस काम आवेगी, यदि निकाली जावे तो धर्मशालाके कामोंमें लगे। अपने मनमें यह सोचता हुआ पादरी तो धर्मशालामें गया, लोग उस स्त्रीको गाड़कर चले गये। फिर वह पादरी जब सो गया तब थोड़ी देर पीछे उठ खड़ा हुआ। उठकर कबिरस्तानकी ओर चला, मुरदा स्त्रीकी कब्रपर पहुँचा चाहा कि, कब्र खोदकर उस स्त्रीके हाथसे अंगूठी निकाल लूँ। लोगोंने उसको यह काम करते देखा तो पकड़ लिया कहा कि, ऐसा काम क्यों करते हो? उसकी नौंद टूटी वह जाग गया। अपनेको कब्र खोदता पाकर लज्जित हुआ कहा कि, मैं तो स्वप्नावस्थामें यह काम करता था। लोगोंको मालूम भी था कि, उसका स्वप्न वैसाही था।

एक दिवस उस मनुष्यने एक ऐसा घृणित कार्य किया जिससे उसे बड़ी लज्जा आई। उसने एक क्वारी लड़कीके साथ सम्भोग किया। लोगोंने उसको पकड़कर जज साहबके सामने खड़ा किया। उससे प्रश्नोत्तर होने लगा, उस समय उसकी निद्रा भङ्ग हुई। अपनेको जजके सामने खड़ा पाकर पूछने लगा कि, मुझको यहाँ कैदकर क्यों लाये हो? मुझको तनिक भी सुधि नहीं। लोगोंने कहा कि, तू एक महाकुकर्मके दोषमें फँसा है। उसने कहा कि, मुझको सुधि नहीं। स्वप्नावस्थामें मुझसे यह कार्य हुआ है। मैंने इच्छापूर्वक नहीं किया है। जजने उसको स्वप्न स्थिति जाना। विदित होगया कि, इस पादरीके स्वप्न विचित्र हैं। उस पादरीने स्वप्नावस्थामेंही अनेकों पुस्तकें लिखी थी। उसके स्वप्नका हाल जानकर छोड़ दिया उसको किसी प्रकारका दण्ड नहीं दिया।

इसी प्रकार यह जीव चारों अवस्थाएँ जागृत, स्वप्न, सृषुप्ति और तुरियामें बँधा हुआ सब कार्य करता है। भूलकर अपने कार्योंको नहीं जानता। दास, स्वामी दोनों इन्हीं चारों अवस्थाओंमें फँसकर सब कार्य करते हैं भूल जाते हैं, यहीं कर्ता तथा कर्म होकर सब कौतुक कर रहा है, भ्रमसे दूसरा कर्ता मानता है। अपना कर्तव्य भूल गया है। जागृत अवस्थामें जो कुछ यह करता