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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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मैं जो कबीर साहबकी कोटवाणी कहलाती है, एक भागका नाम ऋग्वेद है—इससे ऋग्वेद निकला । दूसरी कबीर साहबकी जो टकसार वाणी है उससे यजुर्वेद निकला और इस टकसार वाणीके छायासे यह यजुर्वेद हुआ । तीसरी कबीर साहबकी जो मूल ज्ञानकी वाणी है जो राग और गीतका भाग है, उसका नाम सामवेद है, उसके छायासे सामवेद बना । चौथा कबीर साहबका जो बीजक ज्ञान है—उसके एक भागका नाम अथर्वण वेद है. उसके ढङ्ग पर अथर्वण वेद बना । चारों वेदोंकी उत्पत्ति तथा आरंभ यही है । इस प्रकार स्वयंसंवेदमेंसे यह परसमवेद उत्पन्न हुए ।

अठारहवाँ प्रकरण

चार गुरुओंका वर्णन जो कबीर साहबके चले हैं ।

(ग्रन्थ सुकृति आदिभेदके अनुसार)

(देखो कबीर साहबके ग्रन्थ सुकृत आदिभेदमें लिखा है,) कबीर साहबने संसारके मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करनेके निमित्त अपने चार शिष्य प्रकट किये, सो वे पृथ्वीके चारों दिशामें नियत किये गये । प्रत्येक दिशामें एक शिष्य मानव जातिके गुरु ठहरे । सो वे चारों अपने अंशों सहित पृथ्वीपर प्रगट होकर, समस्त मनुष्यजातिको धर्म सिखलाते हैं तथा दिखलावेंगे । ये चारों गुरु समस्त मनुष्यों को कालपुरुषके हाथसे छोड़ाने वाले हैं और उन्हीं द्वारा तथा उन्हींकी सहायतासे सब मनुष्य परमधामको सिधारते हैं ।

पहिले गुरु-लोकमें सुकृत अंश, कहिये और भवसागरमें गोसाई धर्म-दासजी कहिये, इनके बयालीस वंश हैं. उत्तरकी ओर गुरु ठहराये गये । ऋग्वेद जम्बूद्वीप, भारतखंड, गढ़बांधो नगरमें प्रकट हुए । उनको कोटज्ञानकी वाणी दिया, उस वाणीके अनुसार उन्होंने पन्थ चलाया और सत्यपुरुषकी भक्तिका प्रचार किया ।

दूसरे गुरु-लोकमें अक्षय अंश कहिये और भवसागरमें गोसाई चतुर्भुज-दासजी कहिये । ये अपने वंशों सहित दक्षिणदेशमें प्रकट होंगे और उनका यजुर्वेद है और नगरद्वीप करनाटकमें प्रकट होकर और कबीर साहबकी टकसार वाणी लेकर, अपने धर्मका प्रचार करेंगे और मनुष्योंका मुक्ति करावेंगे ।

तीसरे गुरु-लोकमें जोहङ्ग अंश कहलाते हैं, भवसागरमें राय बंकेजी आपका नाम है और उनके सोलह अंश हैं पूर्वदेशमें सामवेद लेकर दरभंगा नगरमें आप प्रकट होंगे, मूलज्ञानकी वाणी लेकर अपना धर्मोपदेश करेंगे ।