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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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समीक्षा—यहाँ विचारना उचित है कि, वही भोला बालक आदम था जबतक वह अनजान था यानी अत्यंत मूर्खताकी अवस्थाको अनजान जानना उचित है तब उसके लिये वैकुण्ठके सुख प्राप्त थे। वस्तुतः वैकुण्ठ, नरक, भय, चिन्ता, सुख, दुःख सब मूर्खोंके लिये हैं, बुद्धिमानोंके लिये नहीं हैं। बुद्धिमान तो वैकुण्ठ, नरक, दुःख, सुख सबको तुच्छ समझते हैं। वैकुण्ठ तथा नरकके दुःख सुखको यह आत्मा पूर्वसे ही जाननेवाली है। यदि यह पूर्वकर्मोंसे पवित्र होता तो ऐसा न होता यह बच्चा जितने कार्य करता है वे उसके पूर्वकर्मोंसे सम्बन्ध रखते हैं इसने पूर्व जन्ममें देह धरकर अवश्यही कर्म किये हैं। सब कर्मोंका जाननेवाला और कर्ता है। कोई जीव पशुओंमें हँसना नहीं जानता है। पर जब आत्मा मनुष्यका जामा (शरीर) पहनती है, तब उसको हँसने तथा रोनेका ज्ञान होता है। क्योंकि, उसको जब वैकुण्ठके सुख दिखाई देते हैं तब यह हँसता है, जब अन्तर्धान होते हैं तब यह रोता है। अन्यान्य पशु इस कार्यसे वञ्चित हैं। कहीं कहीं पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम अज्ञानावस्थामें हँसना नहीं जानता था पर जबसे उसने आज्ञा भङ्गकी तबसे उसको हँसना आया। इसका कारण यह है कि, आदम पहला आदमी था अनेक समयतक निर्जीव पदार्थ पत्थर इत्यादिके समान परलोकमें रह आया। हँसना रोना सब भूल गया था। इस कारण आदममें और आदमके बच्चोंमें इतना ही अन्तर है। क्योंकि आदम अनेक कालतक गतिविहीन पड़ा रहा। जब संसारमें आया तब अन्यान्य आदमजादोंके समान दुःख भी न पाया था। क्योंकि, हँसना और रोना भूल गया था। पर जब इसको शौतान गुरु मिला तब तुरन्त ही उसको सब विद्याओंकी सुधि हो गई। उसके पूर्वजन्मके सब कर्म प्रगट हो गये। यद्यपि बच्चा मूर्खता तथा आज्ञाना-वस्थासे अनजान कहलाता है पर उसके पूर्वकर्मके सब चिह्न उसमें प्रगट हो जाते हैं।

जो कहते हैं कि, फरिश्ते वैकुण्ठसे आत्मा लाकर मातृगर्भके पुतलेमें डाल देते हैं इसमें इतनी विभिन्नता है कि, मृत्युके पीछे आत्मा ऊपरको चढ़ती है ऊपरसे फिर किसी भोजन द्वारा जीवके वीर्य पथसे गर्भमें प्रवेश करती है। इस पर केवल इतना कहता है कि, क्या मनुष्य तथा पशुके वीर्यका एकही ढङ्ग है ? सबकी उत्पत्ति एकही स्वरूपसे हुआ करती है ? तनिक भी विभिन्नता नहीं ? क्या केवल मनुष्यकी ही आत्मा वैकुण्ठसे लाई जाती है कि, सब जीवोंकी ? क्या वीर्यको केवल शरीर बनानेकी सामर्थ्य है, रूह डालने का नहीं है ? वीर्य आत्मासे रहित नहीं। क्योंकि कबीर साहबका कथन है : चाममें माँस है