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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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स्थानमें न्यायके लिये जावेंगे। हशर (महाप्रलय) गाह सदैवसे प्रचलित हो रहा है। पृथ्वीमें अनगिनती छिद्रसे तात्पर्य्य चौरासी लाख योनिसे है, अनगिनती योनि है सो सब भग है और आवहयात वीर्य है कि, यह आकाश अर्थात् ब्रह्माण्डसे उत्तरता है गर्भमें प्रवेश करके स्वरूप बनाता है। पुरुष आकाश है तथा स्त्री पृथ्वी है जब आरम्भमें पुरुष आकाश तथा पृथ्वी स्त्रीका स्वरूप हुआ तब वीर्य गर्भमें जाकर एकसे अनेक स्वरूप हो गया प्रत्येक छिद्रसे समस्त जीव निकल पड़े। न्याय यही है कि, अपने भाग्यानुसार सबको दण्ड तथा सुख है।

५५—देखो कुरानका चौबीस सिपारा सूरय मोमन (४) रकूअ (४५-४६) आयत पर्यन्त लिखा है कि, फिर बचा लिया खुदाने मूसाको बुरे दावसे जो करते थे और उलट पारी फिरऊनवालोंपर बुरी तरहकी विपत्ति। आग है कि, दिखा देती है उनको संध्यातक प्रातःकाल और जिस दिवस उठेगा कयामत (महाप्रलय) को प्रवेश करावेगा। फिरऊनवालोंको कठिनसे कठिन विपत्तिमें।

समीक्षा—कयामत (महाप्रलय) के पूर्व सहस्रों नरक तथा वैकुण्ठको जा चुके। सो बात पहले प्रमाणित हो गई। कयामत (महाप्रलय) की किसीको आवश्यकता नहीं रही। सकता की मृत्युको कब्रका कण्ट समझा गया। सुकर्मियोंको वैकुण्ठ तथा कुकर्मियोंको उस समय नरक दिखाई देता है। सब पुण्य फल तथा पापफल स्वप्नवत् बीत जाता है यह जीव अपने कर्मोंके अनुसार दुःख तथा सुखमें डाला जाता है। यहाँपर मैं मुसलमानोंकी प्रत्यक्ष गलती दिखाता हूँ। जो कोई सोचेगा समझेगा वो सुख पावेगा।

एक ब्रह्माण्ड है तथा दूसरा पिण्ड है। ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंका एक स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें स्वरूप तथा एक अवस्था है, उसमें तनिक भी विभिन्नता नहीं, दोनोंके स्वरूपमें ब्रह्माण्ड पिण्डकी एकता है। सब पृथ्वीके तत्त्ववेत्तागण मानते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंका एकही स्वरूप तथा अवस्था है। जब पिण्ड दोनोंका और ब्रह्माण्ड एकही स्वरूप तथा अवस्था है तो ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड दोनोंको महाप्रलय भी एकही स्वरूपका होना चाहिये। अपने समयपर पिण्डका विनाश होता है अपने समयपर ब्रह्माण्ड नष्ट होता है। एकही स्वरूप नष्ट तथा स्थितिका है। पिण्डकी स्थिति थोड़ी है ब्रह्माण्डका वय अधिक है। दोनों अपने अपने आयुका दौरा पूरा करके नष्ट हो जाते हैं।

इस बातमें यहूदी ईसाई तथा मुसलमान सभी बहुत भूल करते हैं कि, पिण्डके विनाशको ब्रह्माण्डके विनाशके समयका हिसाब लगाते हैं। क्योंकि,