Skip to content
SarvaKosh
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 782 of 1367

Read in context
Page 782

उससे मनुष्यका शरीर छुड़ा लिया जावेगा। उस एक तोड़ेवालेका फल उस दश तोड़ेवालेको दिया जायगा और उसकी बढ़ती होगी। भले भूत्यको वह कमाईका बल अधिक दिया जायगा, जो सीमाबद्ध मानुषिक बलके बाहर है। सर्पिकाको तोड़ा देनेका तात्पर्य यह है कि, सर्पिका साधु तथा गुरु हैं। यदि वह गुरुओंके शरण जाता तो भी कुकर्मोंसे बचता। क्योंकि, शरणागति भी बहुत उच्चपद है व यथार्थ शरणागति होनेपर उससे अधिक परिश्रम न कराया जाता। वह निकम्मा नौकर जिसके पास कुछ नहीं है जो कुछ उसके पास होगा वह भी ले लिया जावेगा। इसका यह तात्पर्य है कि, उससे मनुष्यका शरीर ले लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास मानुषिक शरीर ही है जो विद्या तथा गुणका भण्डार है वह है वह भी छीन ली जावेगी।

जागृत अवस्था स्वप्नावस्था और सुषुप्ति यह तीनों अवस्था जीवके लिये हैं, तुरिया ईश्वरके निमित्त है, जो ये चारों अवस्था नियत हुई हैं, उनमेंसे प्रथम जागृतावस्था तो मनुष्यके लिये है। क्योंकि, यह मनुष्य जाग्रितावस्थामें स्थित है। यह जाग्रितावस्था बुद्धिकी अवस्था है, इसीमें भलाई तथा बुराईका हिसाब है। जाग्रितकी अवस्थासेही मनुष्य तुरियावस्थाको प्राप्त करके ईश्वर पदको प्राप्त कर सकता है स्वप्नकी अवस्था पशुओंके लिये है। क्योंकि, सब पशु अनजान तथा निर्बुद्धिताकी अवस्थामें हैं यदि कोई दोष करें तो उनके पापकी कोई गणनाही नहीं की जासकती। इसी प्रकार सभी पशु अचेत निद्राकी अवस्थामें हैं, उनके पापोंका कोई हिसाब नहीं किया जाता। जड़ पदार्थ तो सुषुप्तिकी ही अवस्थामें हैं। जो कोई जाग्रत्वस्थामें आकर सुकार्थ न करे तो वह निश्चय स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थामें डाल दिया जावेगा। जो कोई नङ्गाही मनुष्य शरीरके अतिरिक्त और कुछ न रखता हो उससे क्या लिया जावेगा। निस्संदेह उससे मनुष्यका चोला ही छीन लिया जावेगा। क्योंकि, उसके पास केवल मनुष्यकी देह मात्रही रह गई है, दूसरा कुछ नहीं। इसके अतिरिक्त उससे कुछ लिया नहीं जासकता न कोई अन्य वस्तु उसके पासही है।

वह बाहर अन्धकारमें डाला जायगा। बाहरके अन्धकारसे यह तात्पर्य है कि, जो देह बुद्धि तथा ज्ञानके बाहर है, वो देह अज्ञानी पशु तथा जड़ पदार्थोंकी है, जब जीव मनुष्यकी देहसे अलग होता है तब अन्धकारमें पड़ता है। जप, तप, ज्ञान, करने अथवा सीखने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इस निकम्मे नौकरने मनुष्यका चोला पाकर कुछ कमाई न की न तोड़ा सर्पियों (गुरु) को दिया।