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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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प्रणव विराजा रहता है। इसी कुण्डलिनीकी फुँफकारसे यह मन चैतन्य होता है। मनके चैतन्य होतेही समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है। कुण्डलिनी मायामाया वासनाओंसे भरी हुई है भाँति भाँतिकी सांसारिक वासनाएँही उसका विष हैं। जब उस कुण्डलिनीमें फुर्ना होती है तब मन प्रगट होता है। जब निश्चय हुआ तब बुद्धि उत्पन्न हुई और जब अहम् भाव होता है तब उससे अहंकार उत्पन्न होता है और जब चिन्तन करता है तब चित्त उत्पन्न होता है। जब स्पर्शके सन्मुख होता है तब वायु प्रगट होती है, जब देखनेकी ओर होता है तब अग्नि प्रगट होती है, जब रस लेनेकी इच्छा होती है तब जल उत्पन्न होता है। जब सृंघनेकी ओर ध्यान गया तब पृथिवी उत्पन्न होती है। पाँचों तन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण चौदह इन्द्रियाँ और सब नाडियाँ इसी कुण्डलिनीसे उत्पन्न होती हैं।

तीन प्रकारकी इच्छाएँ हैं। प्रथम—किसी वस्तुके मिल जाने और उसके पानेके निमित्त उद्योग करनेकी इच्छा। यह अज्ञानीकी इच्छा है।

दूसरी यह है कि दुःख और आपत्तिके पृथक् होनेकी इच्छा। यह बड़े अज्ञानीमें होती है।

तीसरी यह कि जो काम करना उसका फल चाहना। जब इच्छानुसार फल न हो तब उसके लिये चिन्ता तथा शोच होता है, यह एक साधारण है।

वासना चार प्रकारकी है। एक सुषुप्ति वासना है, दूसरी स्वप्न वासना है, तीसरी जागृत वासना है, चौथी क्षीण वासना है।

१—स्थावर अर्थात् वृक्ष पत्थर इत्यादिको सुषुप्ति वासना होती है।

२—पशुओंको स्वप्नवासना होती है। उनको वासनाका ध्यान भी नहीं होता।

३—मनुष्य तथा देवताओंको जागृत वासना होती है कि, वे वासनामें ही लगे रहते हैं। यह तो तीन वासनाएँ अज्ञानी जनोंकी हैं।

४—क्षीण वासना ज्ञानीकी है। जब वासना मर गयी किसी प्रकारकी इच्छा नहीं रही, तब संसार लय हो जाता है। संसार वृक्षका बीज वासना है। दसो दिशा संसारके पत्ते हैं। शुभ अशुभ कर्म उसके फूल हैं। मनुष्य पशु वृक्ष तथा पत्थर आदि उसके फल हैं। इस सृष्टिका बीज वासनाएँ हैं। इनके नष्ट करनेसे संसार भी नष्ट हो जाता है, वासनासे स्थिर रहता है। शारीरिक और मानसिक दो रोग हैं, दोनोंही वासनाओंसे उत्पन्न होते हैं। यही दो प्रकारके रोग हैं। शारीरिक रोगको व्याधि और मानसिक रोगको आधि कहते हैं।