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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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विषयियोंके निमित्त पूर्व लिखित येही तीनों पदार्थ हैं जबतक संसारमें रहते हैं तबतक तो विषयवासना और शरीरके पालन पोषणमें लगे रहते हैं। मृत्युके पीछे वैकुण्ठमें आनन्द लूटते तथा अप्सराओंसे सम्भोगकी आशा रखते हैं। विषयी पुरुषोंकी विषय भोगसे कभी निवृत्ति नहीं होती। जैसे संसारमें वैसेही परलोकमें भी इसी वासनामें फँसे रहते हैं। वासनायें इनको उसी प्रकार नचाती फिरती हैं, जैसे कि, कलन्दर बन्दरको नचाता फिरता है उसी मनकी गतिसे सब मनुष्यों की हीन दशा हो रही है।

यह मन निरञ्जन है। नेत्रोंके श्वेत स्थानमें इसका निवास है। इसी स्थानपर बैठकर समस्त विषय वासनाका आनन्द लेता है। इस कारण प्रथम नेत्र गतिमान होते हैं। पहले नेत्रोंमें गति होती है पीछे देह चलती है, तब उसकी कामना पूरी होती है। निरञ्जन आँखोंकी सफेदीमें बैठकर सब भोग भोगता है। यही कारण है कि, रुग्नावस्थामें मनुष्यका समस्त शरीर तो शुष्क हो जाता है पर उसकी आँखोंकी डलियाँ ज्यों की त्यों रह जाती हैं। वह न कभी घटती हैं और न बढ़ती हैं। यह निरञ्जनका स्थान सर्वदा समानरूपसे रहता है। सर्व शरीर सूख जाता है तथापि निरञ्जनकी ज्योति समान रूपसे रहती है। इसी कारण साधु लोग पहले अपनी दृष्टिको साधते हैं जिससे इधर उधर बहकने न पावे। आँखोंको एक स्थानपर स्थिर रखते हैं। जब आँखोंको अपने वशमें कर लेते हैं तब फिर मनको आधीन करते हैं। नेत्रोंके भटकनेसे मन सदैव अस्थिर तथा चञ्चल रहता है। जब यह मनही वशीभूत न हो तो अपने रूपका ज्ञान कैसे होगा ?

अन्धी आँखोंमें निरञ्जन मिट जाता है। जब उसका स्थानही नहीं रहता तो वह भी नहीं रहता। इस कारण जो अन्धा होता है उसकी बुद्धि अधिक होती है। अन्धा बिना देखे सब कुछ जान लेता है। अन्धेकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण होती है।

घोर निद्राको सुषुप्ति कहते हैं। वो दो प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञान सुषुप्ति दूसरी ज्ञान सुषुप्ति। इन दोनों सुषुप्तियोंमें संसार नष्ट हुआ जान पड़ता है परन्तु संसारका बीज रहता है। यदि बीज न होता तो वही कदापि जाग्रत अवस्थामें न आता। इसी कारण जब ध्यानमें लीन होता है तब बड़ा प्रकाश उत्पन्न होता है। इस प्रकाशमें वासना तो दूर हुई जान पड़ती है पर वासनाका बीज नष्ट नहीं होता। ये मनके व्युत्थित होतेही फिर उसी रूपमें प्रगट हो जाती है। सदाकी तरह फिर संसारको उपस्थित करती है पर जब