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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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भूले थे, ये बिलकुल रामरूपही हो चुके थे, रामने इन्हें इतना अपनाया था कि, रामकी अनन्तबातें इनमें आगई थीं। वे क्या थे किस भूमिका पर पहुँचे थे इसका भेद तो वे ही सन्त जान सकते हैं। जिन्हें कबीर साहिबकी तरह रामने अपना रखा हो अथवा रामके भक्तोंके भक्तोंने जिन्हें अपनी सच्ची दासकोटी दे रखी हो, संसारी झूठे पुरुषोंमें ऐसी बुद्धि कहाँ है जो उस सच्चेका पता पासकें। जो अन्धे हैं अविद्यामेंही रहेगा। यदि अविद्या न होती तो यह संसारही न होता, जब अविद्या दूर हुई तो फिर संसार कहाँ है। यह सच्ची भक्तिसेही दूर हो सकती है। कबीर सर्वज्ञ तथा सारे संसारकी मुक्तिका कारण है। वह गुप्त है उसका पता संतोंद्वाराही प्राप्त होता है, वह कबीर अद्वितीय तथा अमर है। वह कबीर सबसे परे है, वह कबीर समस्त वासनाओंसे न्यारा है, वह कबीर किसीसे मैत्री अथवा द्रोह नहीं रखता वह पवित्र है, पालनकर्ता है। पाप तथा कुत्सिततासे पृथक् रहता है, वह कबीर वही है जिसने धर्मदासका गुरु बनकर संसारमें बयालीस वंश स्थापित किये उस कबीरको जो कोई पहचानेगा उसका बेड़ा पार होजायगा। जिसको उस कबीरका ज्ञान होगा वही दोनों लोकोंमें परमपद पाकर उच्च स्थितिपर आरूढ होजायगा।

यह कबीर पहचाना नहीं जाता, कारण यह कि—स्वास्थ्योंने उस सत्य कबीर को छिपा रखा है। जैसे पहले वैसेही अबके लोग भी कबीरके नामको छिपाते हैं, जहांतक होसके इस कबीरकी श्रेष्ठतापर और उसके नाम पर परदा डालते हैं। कितने तक तो ऐसे हैं जो साहबका नाम सुनकर जल भरते हैं। क्योंकि, वैसे सब मनुष्य झूठ तथा काम क्रोधादिकी वासनाको हृदयसे चाहते हैं। इसी कारण सत्यपुरुषकी भक्तिसे भागते हैं एवं कालपुरुषकी भक्तिको पसन्द करते हैं। असत्य पन्थ, भयानक, संकीर्ण, एवं सत्यपूर्ण प्रकाशमय तथा मुक्तिप्रद है।

उल्लू, छुलूँ दर और चमगीदड़ इत्यादि जितने इस प्रकारके जीव हैं उनको प्रकाशसे बड़ीही घृणा है, वे अन्धकारको ही चाहते हैं। अन्धकारमेंही उनका समस्त कार्य होता है। जबतक प्रकाश रहता है तबतक वे किसी अन्धकारमय गड्ढेमें छिपे रहते हैं। जब अन्धकार होता है तब हर्ष सहित बाहर निकलते हुए अपना कार्य करते हैं। इसी प्रकार सब पामर पुरुष स्वसंवेदकी शिक्षासे भागते हैं। इन जीवोंकी आंखे प्रकाश देखना स्वीकार नहीं करती, उनके हृदयमें वह सत्य बल नहीं है। सांसारिक वासनाओंने उनको नितान्तही अयोग्य कर दिया है, इस कारण वे विवश हो रहे हैं।

कबीर साहबने पहलेसे कहा है कि, मैं समस्त संसारका उद्धार कर सकता हूँ। मेरे ही द्वारा मनुष्य मुक्ति पाता है। कोई दूसरी युक्ति नहीं है। वही बात नीरू जुलाहे और नीमा जुलाहीसे कही। जब कि, कबीर साहब केवल एक