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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कारण यह है कि, उसके अनुगामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिखा ।

एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो—वह सिक्खोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके आचार्य नानक पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तमें प्रगट हुये थे । वे कबीर साहबके शिष्य थे । अतएव वह एक प्रकारके हिन्दू एक ईश्वरवादी थे । परन्तु उनके धर्मका मुख्य अभिप्राय सबको एक धर्ममें मिलाकर भेदभाव मिटानेका था ।

द्वितीय प्रमाण २—भारतके इतिहासका संक्षेप, जिसको कौलास चन्द्र मच्छना बी. ए. और देवेन्द्रनाथ राय बी. ए. आफ एल. एम. एस. कालेज भवानी-पुरने लिखा है । वह इस प्रकार है, देखो भारतके इतिहासके एकसौ पाँच पृष्ठ में ।

रामानन्दके बारह शिष्योंमें कबीर साहब बड़ेही सुप्रख्यात हुये । उन्होंने बीजकका निर्माण किया । पण्डितोंके लिये शास्त्र तथा वेदके आशयको गूढ़ बताया । नानक साहबने सर्व धार्मिक युक्तियाँ कबीर साहबसे सीखी थीं ।

फिर देखो उसी पुस्तकके एकसौ आठ पृष्ठमें नानकशाहने सिक्खधर्म, पन्द्रहवीं शताब्दीमें स्थापित किया । उन्होंने सर्व धार्मिक रीतियाँ कबीर साहब से प्राप्त कीं ।

तृतीय प्रमाण ३—एच. एच. विलसन साहब अपनी दरसनामक किताबमें तीसरे प्रकरण पृष्ठ ६९ में हिन्दुओंके धर्मके विषयमें लिखते हुए कबीरपंथियोंके विषयमें लिखते हैं कि, कबीर साहबकी शिक्षाका प्रभाव उनके मुख्य २ शिष्योंपर बहुत पड़ा । वो उनकी अनुपस्थितिमें उससे भी बढ़कर सिद्ध हुआ । क्योंकि सर्व पन्थोंको इस पन्थकी शाखायें कह सकते हैं । गुरु नानक, साहब जो हिन्दुओं में एक विशेष धर्मके आचार्य हुये हैं, प्रायः अपने धार्मिक ध्यानमें कबीर साहबका ही प्रायः अनुकरण किया है ।

चतुर्थ प्रमाण ४—ग्रन्थ लेखकके पहिले लिखेका व्याख्यान करनेके समय मालकाम साहबके लेखसे निम्नलिखित अनुवाद किया है । “प्रख्यात तथा सुप्रसिद्ध कबीरके विषयका नानकने अनुकरण किया है । कबीर पंथी कहते हैं, कि, नानकने कई सहस्र साखिया कबीर साहबके पुस्तकोंसे ली हैं ।” मालकाम साहबकी पुस्तक भारतके इतिहासको देखो । वहां यह सब मिलेगा ।

पंचम प्रमाण ५—मोनियर विलियम साहब एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज जिन्होंने स्वयम् भारतवर्षका भ्रमण किया है जो ब्लेयल कालेज आक्स फोर्डमें प्रोफेसर थे, अपनी पुस्तक भारतके धार्मिक ध्यान तथा आयुके छठे प्रकरणके १५८ पृष्ठमें लिखते हैं जो इस प्रकार आरम्भ होता है ।