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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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की और कर रहे हैं कि, मनुष्योंको सत्यपन्थसे भटका दें इस कारण कबीर साहबने पहलेहीसे प्रबंध कर दिया है कि कुछ गाड़िया पुस्तकोंकी दिल्ली नगरमें गड़वादी हैं जो नियत समय पर निकलेंगी वे शुद्ध तथा निर्दोष हैं । वही प्रचलित होगी जिनमें कुछभी दोष न होगा । उपरोक्त पुस्तकें सर्वथाही निर्दोष और अनुपम हैं । उन ग्रन्थोंके पढ़ने सुननेसे यमके कपट निरर्थक हो जावेंगे । केवल चारसौ वर्षोंने कबीर साहबकी वाणीकी यह दशा होने लगी तो ऐसी अवस्थामें इतिहास तथा अन्यान्य पुस्तकोंकी क्या गणना है ! जो अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें थीं सब दूषित हो गईं, वे तनिक भी शुद्ध नहीं रहیں । सब ग्रन्थ कट कुट हो गये हैं पर स्वसंवेद अशुद्ध नहीं होता क्योंकि, सब औपधर्म्यके ग्रंथोंके श्रोता वक्ता मर गये । परन्तु स्वंवेदके श्रोता वक्ता कदापि नहीं मरते, सदैव जीवित रहते हैं । स्वसंवेद जब मृत्युके समीप पहुँचता है तो फिर उसमें जी डाला जाता है जिससे हरा भरा हो जाता है । स्वसंवेदकी शिक्षा उत्पत्ति कालसे लेकर आजतक बराबर चली आती है । परन्तु उस पर चलनेवाले थोड़े होते हैं । उसका कारण ये है कि, १-कालपुरुष मुंह २ से बोलता हुआ संसारको भटकाता है जीवोंकी बुद्धिको नष्ट करता हुआ अन्तःकरणको अशुद्ध कर देता है । २-यह जीव पशुवत् कर्मकी तृष्णाको नहीं छोड़ता है, मांस खाता है, निषेध कर्मोंको करता है । उसमें ऐसा लुब्ध हो जाता है कि, उनको छोड़ना उसे अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है । ३-इस संसारकी मान बड़ाई तथा लज्जा आदि भी इस जीवको नहीं छोड़ते । ४-प्रत्येक पुरुषकी बुद्धिपर बैठकर काल पुरुष अपनी प्रभुताई कर रहा है । ५-कबीर साहबकी दयादृष्टि हो पर उसके गुरुकी दया न हो तो भी कार्य्य नहीं चलता दोनोंकी ही दयादृष्टि होनी चाहिये । जिस समय गुरु दया करते हैं तो कबीर साहबकी उस पर पूरी दयादृष्टि हो जाती है फिर उसके उद्धार होनेमें कोई भी कसर नहीं रह जाती । सत्ययुग द्वापर त्रेता और कलियुगके हंसोंके लिये युगानुरूप सत्यपुरुषका शास्त्र रहा है, जिससे सहजही में जीव सत्यपुरुषके उपदेशोंको समझले । जिस किसीने इन चारों युगोंमें सत्यपुरुषका कहना न माना उसे दुखसागरमें मग्न होना पड़ा पर जिसने कथन माना उसका उद्धार हो गया कालका उनपर कुछ भी प्रभाव न चला । सत्यपुरुषका शास्त्र युगानुसारी भाषामें रहता है कलियुग के जीवोंको जैसा चाहिये उसी भाषामें सत्यपुरुषका शास्त्र मौजूद है इसीसे अग्नित जीवोंका उद्धार हो गया है इबराहीम अद्वम आदिको इसी युगकी भाषामें उपदेश मिला था ।