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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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शरणमें आओगे तब तुम्हारे सब अपराध क्षमा किये जायँगे, तब तुम मुक्ति पाओगे जबकि सब एक रङ्ग हो जावेंगे । जितने लोग कबीर साहबकी आज्ञापर चलते हैं उनकी धर्म पुस्तक स्वसंवेद है । यह स्वसंवेदही यथेष्ट है अन्यान्य सभी नकल है । जितने शास्त्र तथा विद्या हैं वो सब स्वसंवेदसे हैं । स्वसंवेद एक नदी है । जिससे एक बूंद निकल कर सर्व संसारमें फैल रहा है । उसीमें चिड़िया एक चोंच भरकर प्यास बुझा लेती है । इसी प्रकार सारे पृथ्वीसे परमेश्वर और संसारभरके आचार्य इस स्वसंवेदका कोई भाग अथवा कोई टुकड़ा निकालकर अपना शास्त्र बनाके बैठे हैं । स्वसंवेदहीसे सभीने श्रेष्ठता पाई है परन्तु अपने पिताकी प्रतिष्ठा तथा मर्यादाको किसीने न जाना । इसकी सूक्ष्मता तथा स्वच्छतासे कोई विज्ञ नहीं । सहस्रोंने पन्थ चलाया चलाते हैं वो सब कबीर साहबकी वाणीका आसरा लेकर अपने अपने पन्थको प्रचलित कर रहे हैं । कितने तो ऐसे हुये और होते हैं कि, कबीर साहबके ग्रन्थ तथा वाणी देखकर अपनी वाणी बनाते और अपनेको कबीर साहबके बराबर अथवा बढ़कर ठहराते हैं । ऐसे कृतघ्न स्वार्थियोंको कभी भलाईकी आशा न करनी चाहिये ।

जिस प्रकार भारतवर्षमें हैं इसी प्रकार अरब, फारस, काबुल, तुर्कस्तान, तातार इत्यादिमें कबीर साहबके अनेक धर्मावलम्बी हैं । शेख जुम्नेद बुगदादी और हसनबशरी इन बड़े बड़े शेखोंमें कितनेसे एक तो शेख कबीरका धर्म मानते हैं । कितने मुसलमानी धर्म मानते हैं । पर आपसमें मिले रहते हैं परन्तु इन दोनों प्रकारके शेखोंमें बड़ा भेद है । दोनोंकी रीति न्यारी न्यारी हैं । कबीर साहब प्रत्येक ध्यानपर एक समान भावसे उपस्थित रहते हैं । एक देशसे गुप्त होते हैं फिर दूसरे देशमें प्रगट रूपसे फिरा करते हैं । जैसे एशियाके रहनेवालोंपर दया होती है, उसी तरह अफ्रिका, अमेरिका और योरोप तथा अन्य द्वीपोंके निवासियोंपर भी कृपा हुआ करती है, परन्तु आपका भेद कोई नहीं जान सकता । कहीं से छिपते हैं तो कहीं प्रगट हो जाते हैं । सहस्रों स्थानोंपर कब्र तथा समाधियाँ हैं न कभी जन्म लेते हैं और न कभी मरते हैं । सर्व ब्रह्मण्डोंमें स्वच्छन्द लीला करते हुए अधिकारियोंको उपदेश किया करते हैं ।

सन् १८५२ ई. का वृत्तान्त है । मैं उस समय सेयालकोट था, उसी समय मुझको एक कबीरपन्थी साधु मिला जब मैंने उसको देखा तो उसके पैरकी उँगलियाँ झरी दिखाई दीं । मैंने उससे पूछा कि, तुम्हारे पाँवकी उँगलियाँ कैसे झर गयीं ! उसने उत्तर दिया कि, जब दोस्त मुहम्मदख़ाँ अमीर काबुल जीवित था । अंग्रेजी सैन्य युद्धके निमित्त काबुलपर चढ़ गयी थी, उस समय मैं भी काबु-