कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसत्यनाम
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिंत, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय
कबीर, सुरतियोगसंतायन, धनीधर्मदास, चारगुरु तथा
वंशनकी दया । मुक्तामनिनाम', चूरामणिनाम', सुदर्शननाम,
कुलपतिनाम', प्रमोधगुरुबा'लापीर, कमलनाम', अमोल'
नाम, मुरतिसनेहीनाम', हक्कनाम', पाकनाम', प्रगट
नाम', धीरजनाम', पं. श्री उग्रना' म साहब, पं० श्री
दया' नाम साहबकी दया । बंशब्यालीसकी
दया कबीर साहबके अधिकारी वंश—
प्रतापी वर्तमान आचार्य श्री १०८
महंत काशीदासजीसाहब की
दया । सर्व संत महंतन.
की दया ।
श्रुति
मुण्डक उपनिषत् प्रथम प्रपाठक
द्वे विद्ये वेदितव्य इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥४॥
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं
निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥५॥
अथर्वणवेद ० मु० उ० ॥ १ ॥
अर्थ—विद्या दो भांतिकी हैं जिसको ब्रह्मवेत्ता लोग परा और अपरा कहते हैं । दोनोंमेंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, और शिक्षा, कल्प, व्याकरणं निरुक्त, छन्द, ज्योतिष आदि सब मिलके अपरा विद्या (परसम्बेद) कहलाती हैं और जिससे अविनाशी ब्रह्मजाना जाता है उसे परा विद्या (स्वसम्बेद) कहते हैं ।