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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जहँ मधुकर यक विप्रको नाऊं । चारसौ हंस लोक धर पाऊं ॥
हंस बयालीस लीन्हें सारा । पहुँच्यो महापुरुष दरबारा ॥
और हंस आनदीपमें किया । जिनजीव जैसे देह तब दीया ॥
अब द्वापरका कहूं विचारा । नृप नरहरि भुजकीन्ह उबारा ॥
सातसौ हंस परवानक कीना । कुटुम्ब सहित पायाना दीना ॥
चन्द्र विजय घर इन्दुमती नारी । तासंग राजा लियो उबारी ॥
केतो पूछो जीव सनेहा । गनत गनत नहिं आवै छेहा ॥
युगन युगन भवसागर आऊं । जो समझे तेहि लोक पठाऊं ॥
शब्द हमारा माने कोई । तो यमपुर नहिं जाय बिगोई ॥
इतनी बात कही समझाई । राजाके परतीत समाई ॥

यहाँ राजा अत्यंत नम्रतापूर्वक सत्यगुरुसे विनय करता है कि, मैं बड़ा भाग्यवान हूँ कि, सत्यगुरुने मुझको दर्शन दिया, फिर राजाने सत्यगुरुको चन्दन चौकीपर बैठकर कहा कि, मैं तो सत्यगुरुके चरणोंका सेवक हूँ । समस्त नगरमें समाचार पहुँचा । सब लोक दर्शनके लिये आये । बड़ा हल्ला मच गया कि, राजा जगजीवन अब लोकको जावेगा । तब राजाने अपनी समस्त रानियोंको बुलवाया, सभी आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरीं ।

राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम—चन्द्रमती, हनुमती, भानदेवी, भानुमती, बुद्धामती, प्राणप्यारी, सत्यभामा, अविकला, नामप्यारी, दिलदायक, रङ्गस्वरूपा, सूर्यमती ये हैं ।

राजा जगजीवनकी ये बारह रानियाँ तथा चार पुत्र थे । जब कबीर साहबने उन सबोंके शिरोंपर हाथ रखवा तो सबको अगम ज्ञान होगया । उन्होंने सत्यपुरुषका दर्शन करके अपनेको कृतार्थ किया ।

राजाके चारों पुत्रोंने आकर सत्यगुरुके चरण चूमे । राजा सारी रानियाँ तथा पुत्रोंसहित सत्यगुरुके शरणमें आया । पाँचसौ जीव इस राजाके साथ सत्यलोकको गये ॥