कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextशेषनागजी बहुत भुलाई । देवी भूल दया नहिं आई ॥
जीव अनेक घात जो लाई । अविगतिकी गति काहु नपाई ॥
आप आप सब करें बड़ाई । तुमहूं ब्रह्मा देह जो पाई ॥
कीन्हा खोज अन्त नहिं पाये । तब तुम आप आप ठहराये ॥
तुम्हारे भूले जगत भुलाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥
तैतिस कोटि देवता आहीं । सब भूले कोई पार न पाहीं ॥
तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमहीं सकल दीन भरमाये ॥
जब गरुड़जीके कथनको ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत क्रुद्ध हुए जान लिया कि, गरुड़ने हमको तुच्छ ठहरा लिया है, ब्रह्माने सबको बुलाया राजा इन्द्र अपने दरबारियों सहित और नाग नागिन इत्यादि सब देवते ब्रह्मा तथा गरुड़का वाद विवाद सुननेके लिये आविराजे, ब्रह्माजी बड़े ही क्रुद्ध थे कि, गरुड़ तो हमको तुच्छ और नीच जानता हुआ बटमार बताता है ।
चौपाई—दिव्य दृष्टि में देखा बानी । है कोई पुरुष अगम निर्वानी ॥
इस प्रकार सुन देवता और राजा इन्द्र इत्यादि गरुड़जीके सामने कोई बात नहीं कर सके, सबके सब पराजित हुए, सब मिलकर आदिभवानीके निकट गये, दण्डवत प्रणाम किया । ब्रह्माने कहा कि, हे माता मेरा रचा हुआ तो समस्त संसार है गरुड़ दूसरेको किस प्रकार ठहराता है ! आदि भवानीने उत्तर दिया कि, हे ब्रह्मा ! तू मिथ्यावादी है पहले तूने मिथ्या भाषण किया था, इसके कारण तुझको शाप मिला अब फिर तू क्यों घमण्ड करता है ? यदि तूही समस्त संसारका रचयिता था तो फिर तू किसका ध्यान धरने गया था ? अपनी अज्ञानता तथा मूर्खताको छोड़, सत्यपुरुषका ध्यान कर । महामायाके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मा लज्जित तथा निस्तब्ध हुए । आद्याके सामने किसीको कुछ उत्तर देते न बन पड़ा । तब फिर गरुड़जी बोले—
चौपाई—सुन ब्रह्मा मति है अज्ञाना । तुम माताको कहा न माना ॥
साखी—तुम ब्रह्मा जानो नहीं, भये करमके खोट ।
हम हम करके भूलिया, ताते लगी न चोट ॥
कहैं गरुड़ समझायकै, जनि भूलो अज्ञान ।
साहब एक अगम्य है, ताका करलो ध्यान ॥
सबने निरञ्जन देवताको जगत् रचयिता ठहराया कि, वह सबके ऊपर है । फिर शिवजी अत्यंत क्रुद्ध होकर बोले कि, मेरा बनाया हुआ तो सब कुछ है, मैं चाहूँ तो गरुड़ तुझको अभी समाप्त कर डालूँ । फिर तू बोलने योग्य न रहेगा कि, सत्य पुरुष कौन हैं । यह सुन गरुड़ बोले कि—