कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextतकरीर (कहे हुए) हैं, उसके मुताबिक (अनुसार) मैं लिखा और कहता हूँ। बावजूद कहने और समझानेके उन लोगोंका नोकैजू (शत्रुता) दूर न हुआ और सन १८८५ में फिरोजपुरके चन्द सिकखोंने मेरे साथ कुछ फसाद करना चाहा तब मैंने उन लोगोंसे कहा कि, मैं तो नानक साहब और कबीर साहबको एक रूपही जानता हूँ, अगर आप नहीं राजी हों तो आइन्देको मैं न लिखूंगा। बावजूदे कि, उन लोगोंका मेरे साथ मुपाहसा और मजादला (झगडा और लड़ाई) इस बातपर न था कि, मैंने नानक साहबको कबीरसाहबका चेला क्यों लिखा, बल्कि और बातपर तकरार था, लेकिन अन्दरूनी (भीतरी) बोगभ (ईर्षा-की) इस बातका भी था। इस वास्ते फकीरने कबीर साहबके पांच हजार बरसकी तारीख लिखा और बनाम “तालीमकबीर कलियुग” मशहूर किया; ताकि हर खास व आमको इसकी असली हकीकत (यथार्थता) से आगाही हो। कबीर साहबके तीन युगोंका अहवाल मैंने साफ छोड़ दिया, फकत इब्तदाय (आरम्भ) कलियुगसे लिखा।
उपेयुक्त ग्रन्थकी समाप्तिपर आप लिखते हैं “खतम (समाप्त) हुई किताब “तालीमकबीरकलियुग” सतगुरुकी मेहरबानीसे। बमुकाम शहर फिरोजपुर ता० २२ अक्टोम्बर सन् १८८५ ई० बमुताबिक सम्बत १९४२ विक्रमी आश्विन सुदी १३ बरोज चहारशम्बा (बुध)। इसके पश्चात्-
बडे कबीरमन्शूर
की बारी आती है—आप उसकी दीबाइचा (प्रस्तावना) में इस प्रकार लिखते हैं—
दूसरी बार कबीरमन्शूरकी तरमीम (सुधार) व तरतीब (योजना) के सबब (कारण) का ब्यान।
यह किताब कबीरमन्शूर पहले एक बार मतबा (छापखाना) कोहनूर लाहौरमें छप चुकी है। और इस किताबके पढ़नेके शायक (अनुरागी) बहुत लोग थे, लेकिन मुसन्निक (ग्रंथकर्ता) किताबने, इस किताबका रिवाज आम (सर्वसाधारणमें) देना मुनासिब न समझा। और अपने खास (विशेष) लोग जहबहम्म (अपने पंथके) को मुफ्त दिया। बजह (कारण) इसकी यह थी कि, बाज बाज लोग स्वसम्बदस वाकफियत (जानकारी) रखते हैं, अक्सर (प्रायः) लोग बेखबर (अज्ञात) हैं और जो लोग वाकफ (जानकार) हैं,