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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

Page 557 of 1367

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Page 557

समाना, जीव शिवमें समाना, शिव निरञ्जनमें समाना, निरञ्जन अलीलमें समाना, अलील अलेखमें समाना, अलेख आदिमें समाना, आदि सत्यमें समाना, सत्य आपही आप, माता नहीं, बाप नहीं, गाँव नहीं, ठाँव नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, रूप नहीं, रेख नहीं, दूर नहीं, नियरे नहीं ।

चौ०-पूरण ब्रह्म जो दीसँ देही । सत्यगुरु बतावै दर्शे तबहीं ॥

भगत जनाँ गम पावे कोई । सद्गुरु दाया जापर होई ॥

यह दत्त और कबीरके सत्संगका अमृत दोर है, जिसे पीकर मनुष्य हो जाता है ।

कबीर और नारद ।

नारदजी विष्णुके परम भक्त एवं विष्णुके अवतार कहे जाते हैं । बीना बजाना गाना तथा प्रेम (इशक) में मग्न रहना नाचना आपका काम है । सर्गुण भक्तिमें आपने सहस्रों मनुष्योंको लगाया । जान-बूझकर आपने संसार छोड़ दिया पर जब कबीर साहबसे साक्षात्कार हुआ उन्होंने कबीर साहबकी बातें भली-भाँति समझीं, भली-भाँति सोची; तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर शिष्य होगा । सद्गुरुने उनकी कमीको पूरा कर दिया । कलियुगमें आकर तो स्वयं कबीर साहिबने भी उनकी प्रेम मदिराके गुण गाये हैं ।

सनकादिक और कबीर ।

सनकादिक बड़े प्रसिद्ध ऋषि हैं, बड़े ज्ञानी और तपस्वी हैं, वे भी कबीर साहबका उपदेश सुनकर हंस कबीर हो गए । जब तक सत्यगुरुका ज्ञान नहीं सुना तब तक दूसरे फन्दोंमें थे, पीछे तो ऐसे भक्त बने कि, कबीर साहिबने भी आपके गुण गाये हैं ।

कबीरजी और ऋषभनाथ ।

ऋषभनाथ जैनधर्मके प्रथम तीर्थंकर और श्रेष्ठ पुरुष थे । चौबीस तीर्थंकरोंमें केवल आपको ही श्रेष्ठता है । पहले तो जैनधर्मके समस्त कार्य आपने ठहराए, जैनधर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया । जब कबीर साहबसे आपका साक्षात्कार हुआ, जैनधर्मका भेद सत्यगुरुने कह सुनाया । ऋषभनाथने सब बातें जानलीं, सच्चे सत्यगुरुकी शिक्षा मिली, तब उनने सत्यगुरुके चरण पकड़कर शिष्य हो गये ।

कबीर और भुशुण्डि ।

लोमश ऋषिकी तरह भुशुण्डि ऋषि संसारमें रहते हैं कितनीही उत्पत्ति स्थित तथा बिनाश देखा करते हैं । समस्त कौतुक उनकी दृष्टितलेसे बीता