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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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<!-- image: A circular emblem featuring a seated figure, likely a saint or deity, surrounded by a decorative border. Below the figure is a banner with the text 'श्री कबीर साहब' (Shri Kabir Sahib). -->

कबीर मन्शूर

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प्रारंभिक उपोद्घात

इस ग्रन्थका नाम "कबीर मन्शूर" उर्दूमें लिखा है, इसी नामसे हिन्दीमें भी प्रसिद्ध हो गया है।

मन्शूर शब्द अर्बी भाषाका है। "नशर" का बहुवचन है ॥ "नशर" शब्दका अर्थ है ज्योति, रोशनी, प्रकाश इत्यादि तो मन्शूरका अर्थ हुआ।

"ज्योतियाँ, रोशनियाँ, प्रकाशों" इत्यादि इस हिसाबसे कबीरमन्शूरका अर्थ हुआ, कबीरकी ज्योतियाँ, कबीरके प्रकाश इत्यादि, यदि इसका हिन्दी अनुवाद किया जाय तो "कबीरज्योति" अथवा "कबीर प्रकाश" नाम रखना चाहिये, किन्तु विशेष नामका अर्थ नहीं किया जाता है, जिस नामसे जो प्रसिद्ध होता है, उसी नामसे पुकारा जाता है। इसीलिये इस हिन्दी अनुवादमें भी इसका नाम कबीरमन्शूरही रखा है। दूसरी बात है कि, पहिली आवृत्तिमें यह इसी नामसे छप चुका है और यह नाम लोगोंमें इतना प्रसिद्ध हो गया है कि, अब इसका दूसरा नाम रखा जाना ठीक नहीं है।

स्वामी श्रीपरमानन्दजी साहबको ऐसे नामसे बड़ा प्रेम था आपने सबसे पहले ग्रंथ बनाया है उसका नाम "कबीरभानुप्रकाश" रक्खा है। कबीर मन्शूर भी उसी भावको लिये हुए है। अन्तमें आपने कबीरकौमुदी लिखी है। कौमुदीका अर्थ भी चांदनीका ही है। भेद इतनाही है, उपर्युक्त दोनों ग्रंथ सूर्यके समान उग्रतेजको लिये हुए हैं और कौमुदी चन्द्रमाकी चन्द्रिकाके समान शीतलयुक्त प्रकाशका स्रोतक है।