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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हैं। पूर्णतया काटा छोटा है देखो न्यायदर्शनमें गौतम इस विषयपर इस प्रकार विवाद करते हैं न्यायसूत्रवृत्ति २-२-१३ वैखरीका शब्द अनादि नहीं हो सकता। क्योंकि, प्रथम तो उसका आरम्भ है। यह बोलके समय ही सुना जाता है, तीसरे वह बनावटी कहा गया है। अगले सूत्रोंमें विस्तार पूर्वक कहा गया है जो चाहे सो देखले। न्याय दर्शनके सूत्रोंमें वे परिणाम निकालते हैं कि, वैदिक शब्दको छोड़कर बाकी अनादि नहीं, सदैव वायुद्वारा कानोंमें आता है यहाँ तक कि, कितने ही सूत्रोंमें दृढ़ प्रमाणोंद्वारा उसका खण्डन किया है।

कपिलजी शब्दके अनादि होनेकी बातको मानते हैं। उनका कथन है कि, वैदिक शब्द अनादि है दूसरे प्रत्यक्षमें बनावटी जान पड़ते हैं। फिर यह परिणाम निकालते हैं कि, वेदोंके अनादि होनेकी बात सर्वथा सत्य है, सम्भव भी है। इस शब्दको लोग उत्पन्न करता और उसीसे उत्पत्ति मानते हैं।

कारण यह है कि केवल एक शब्द ओम् द्वारा तीनों लोक और चारों वेद बने हैं। वही उत्पतिकर्ता तथा उत्पत्ति बनकर अनगिनती दिखाई दे रहा है।

छन्द झूलना।

झूठही नाद है झूठही बुंद है, झूठही झूठको खेल सारा।
झूठ मूरत बनी झूठ सूरत बनी, झूठही झूठको स्वैग धारा ॥
झूठ दर्शन कहे झूठ परसन कहे, झूठ निराकार और शब्द सो है।
झूठ अंधकार है झूठ झंकार है, झूठही झूठको चित्त मो है ॥
झूठ गुण तीन और पाँचही तत्त्व हैं, झूठकी कथन यह जगत कर्ता।
झूठही योग है झूठही भोग है, झूठके फँदमें झूठ परता ॥
झूठ जञ्जालते काल धर खात है, झूठके पारखे कौन जाए।
झूठही जगत है झूठही भगत है, झूठ विस्तार चहुँ ओर छाया ॥
झूठ और सत्य दोऊ मिला यह जगतमें, भगत है सोई जो जान सकता।
परम अनन्द जिन झूठ जगमें खेला, सत्य कबीर एक सत्यवक्ता ॥

छः गुरुकी शिक्षाके भीतर जितनी बातें हैं यहाँ तक मायाके सम्बन्धमें वार्तालाप रहता है। पर जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है, तब मायाके सभी संबंध टूट जाते हैं। फिर किसी प्रकारका संदेह नहीं रहता। जब सातवें गुरुकी शिक्षा मिलती है वह अवस्था किसीसे कही नहीं जाती। इन सातों गुरुके उपर स्वयम् कबीर साहब सत्यपुरुष हैं। उसके वाक्य पवित्र है उसमें कोई संदेह नहीं। यदि उसके वाक्यमें कोई संदेह करे तो उसके भाग्यका दोष है। विज्ञान