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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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ए निरञ्जन ! अब तुम रचना करो । निरञ्जनजी आकर कर्मजीकी पीठपर पृथ्वीको बनाते हैं, वे अपने मुंहसे आद्याको उगल देते हैं । दोनोंके संयोगसे तीनों गुण तथा समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । पहले जब उत्पत्ति होती है तब सत्यस्वरूपी ही उत्पन्न होती है । सब निर्दोष होते हैं । वह सत्या अनेक कालपर्यन्त निर्दोष चली जाती है । फिर कुछ कालोपरान्त उनमें पाप लगता है, तब क्रमशः मनुष्य पापोंमें फँसते हैं और जप तप तथा भक्ति मुक्तिकी ओर ध्यान देते हैं तब आचार्य और गुरुलोग मनुष्योंको उपदेश करते फिरते हैं । पर सारे गुरु ब्रह्माण्डके भीतरकी सुध रखते हैं, ब्रह्माण्डके भीतरकी विद्या रखते हैं । पारख गुरुके अतिरिक्त दूसरेमें यह सामर्थ्य नहीं है कि, ब्रह्माण्डके पार पहुँचा सके कारण यह कि, किसी अन्य गुरुको इसकी तनिक भी सुध नहीं कि, भवसागर पार जानेके निमित्त कौनसा मार्ग और कौनसा उपाय आवश्यक है ? सहस्रों ऋषि मुनि कहते हैं कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों झूठे हैं पर वे लोग जान बूझकर फिर क्यों मिथ्यासे लग रहे हैं ? झूठ छोड़कर सत्यसे क्यों नहीं मिलते ? कारण यह कि, जो कोई जानबूझकर झूठसे संबंध रखता है सो वास्तवमें मनुष्यतासे पृथक् हैं ।

प्रत्यक्ष में यह देह मिथ्या दिखाई देती है तो भी पाशविक बुद्धिको विश्वास नहीं होता । जब कोई जीव मरता है, तब उसको काटो तो उसमें एक बूंद जलका भी नहीं रहता, अग्निकी उष्णता और वायुका नाम चिह्न बचा रहता है और कुछ नहीं जाना जाता कि, वे कहाँसे आये और कहाँ चले गये । वास्तवमें वे इतःपूर्व भी कुछ नहीं थे और फिर भी कुछ बचे न रहे । इसी प्रकार साधु सिद्ध लोग होते हैं जिन्हें कि अपना शरीर पलट लेनेकी और अन्य प्रकारकी सिद्धियाँ तथा सामर्थ्य प्राप्त हो चुका है, वे तुरन्त अपनी देह पलट लेते हैं । तनिक भी विलम्ब नहीं लगता । मनुष्य किसी पशुकी सूरत हो जावें, अन्तर्धान हो जावें, उपस्थित रहें, एक रहें, अथवा अनगिनती हो जावें । यदि यह देह सत्य होती तो एक देह छोड़ दूसरी स्वीकार करनेके समय पूर्वकी देह कहीं दिखाई देती वह पूर्व देह कहीं रखनेकी चिन्ता करलेता तब दूसरी स्वीकार करता, जब वह पहलेकी शरीरको छोड़कर बिना झंझट और चिन्ताके दूसरी स्वीकार कर लेता है कहीं अन्य शरीरका चिह्नतक भी नहीं दीखता इससे निस्संदेह जान लेना चाहिये कि, ये दोनों शरीर पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड कुछ नहीं । अज्ञानसे मनुष्य उसको सत्य मान रहा है । झूठको सत्य जान रहा है । इस कारण यह शरीर