कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextकबीर—मानुष वेचारा क्या करे, कहै न खुलै कपाट ।
श्वान चौक बैठायके, फिर फिराय पन चाट ॥ ११० ॥
जब उसे कहनेपर भी बोध नहीं हो तो वो क्या करे ? क्योंकि, कुत्तेको चौकपर बिठानेपर भी वो बारंबार चौकेके चूनको ही चाटता है यानी समझानेपर भी मनुष्य नहीं समझते बारंबार कुत्तेकी तरह विषयोंमें ही मरते हैं ॥११०॥
कबीर मनुष वेचारा क्या करे, जाको शून्य शरीर ।
जूझ झॉक नहि ऊँचिए, कहें पुकार कबीर ॥ १११ ॥
वो मनुष्य क्या करेगा जिसके दिलमें धोखा ही ब्रह्म बनकर बैठो हुआ, है, जिसके कि, हृदयमें अणु मात्र भी प्रकाश नहीं है वो यह समझता हुआ भी कि, इनमें कुछ भी सार नहीं है फिर भी फँसा रहता है वो छुटकारेका उपाय नहीं करता ॥ १११ ॥
कबीर—पूरब उग पच्छिम अयै, भखै पवनको फूल ।
ताहू राहू ग्रासिए, नर काहे को भूल ॥ २३१ ॥
जो सूर्य पूर्वसे उदय होकर पश्चिममें छिप जाता है खानेके लिये भी पवनका ही लहरिया है पर उसको भी राहू ग्रसता है फिर मनुष्य क्यों भूल रहा है कि, मैं ऐसाही रहा आऊँगा ॥ २३१ ॥
कबीर—राम सुमिरिए क्यों फिरे, और की डौल ।
मानुष केरी खालड़ी, ओढे देखा बैल ॥ २७५ ॥
राम राम भी कहते सुनते हैं दूसरोंसे शास्त्रार्थ भी करते फिरते हैं, बिना सोचे समझे दूसरोंके पीछे फिर रहें हैं वे बैल मनुष्यकी खालको ओढें फिरते हैं ॥ २७५ ॥
कबीर—मानुष तेरा गुण बड़ा, माष न आवे काज ।
हाड़ न होते मरनको, त्वचा न बरजत पाज ॥ १९५ ॥
ए मनुष्य ! तू देहाभिमान क्यों कर रहा है, क्या यही तेरा बड़ा गुण है कि, तेरा मांस भी निकम्मा है, हाड़ भी किसी कामके नहीं, उनके भी आभरण नहीं बनाये जाते । न चामसे बाजे ही मढे जाते हैं ॥ १९५ ॥
कबीर—मानुष तेई बड़ पापिया, अच्छर गुरुहि न मान ।
बारबार बनको कहे, गर्भधरे चौखान ॥ १०८ ॥
एक मनुष्य ? तू बड़ा पापी है तूने अकाल पुरुष अक्षरका कहना भी न माना, जैसे बनकी मुर्गी चारों ओर अण्डे देती फिरती है उसी तरह तू भी जनता जन्माता रहा चौरासी लाखमें भ्रम २ करके दुख पा रहा है ॥ १०८ ॥