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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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सामने प्रत्यक्षमें उसका पागलपना तनिक भी जान नहीं पड़ा। पर जब उस-पर पागलपना सवार होता था, तब बड़े उपद्रव मचाया करता था। उन पागलोंमेंसे कोई आकर मेरे साथ भली भली बातें करता। प्रत्यक्षमें तनिक भी पागल मालूम नहीं होता था पर यथार्थमें वह पागल था। उन पागलोंकी सूरत देखकर उनकी अवस्थापर मुझे खेद हुआ। डॉक्टर साहब उनकी औषध करते थे। कुछ लाभ न होता था। क्योंकि, जिसपर उस बड़े वैद्यकी दया हो वही आरोग्य होकर उस घरसे बाहर निकाला जावे।

पागलोंके काम।

एक दिवस ऐसा हुआ कि, गरमियोंका दिन था। उस पागलखानेका जो जमादार था, वह अचेत सो रहा था। दिनके समय वह अकेला पड़ा था। उसका मुहँ खुला था। उसके दाँत दिखाई देते थे। उसी समय एक पागल उसी स्थानपर आ पहुँचा एवं कहने लगा कि, तू मेरे ऊपर हँसता तथा ठट्ठा करता है ! मैं तुझको मारूँगा यह कह एक कक्कड़ उस जमादारके मुहँ पर इस जोरसे मारा कि, उसी समय वह मर गया। उस पागलको तनिक भी सुध नहीं कि, मैंने बुरा काम किया अथवा भला। यदि उसको भले बुरेका ज्ञान होता तो वह ऐसा कार्य कदापि न करता। लोगोंकी जानमें तो उसने बुरा किया पर अपनी समझमें भला किया। कारण यह कि, उसने अपने बैरीको मारा जो उसपर हँसी ठट्ठा कर रहा था।

यहाँ इस उदाहरणसे मेरा तात्पर्य है कि, इस ब्रह्माण्डमें जितने जीव रहते हैं वे सब उन पागलोंके सदृश हैं जो जमादार और सिपाही हैं वे सब गुरु और पथप्रदर्शक हैं और राजकुमार वह है जो योगीसे जगदीश्वर हो गया है। वह भी उसी पागलखानेमें बंद है उस पागलपनेमें एक दूसरेको मारते मरते हैं। एक मनुष्य तो अचेत सो रहा है। दूसरा उसका दाँत निकला देखकर जानता है कि, वह उसके ऊपर ठट्ठा करता है। उसको अपना बैरी समझकर मारता तथा हत्या करता है। इसी प्रकार इस संसारके समस्त मनुष्य एक दूसरेके बैरी बन रहे हैं। एक धर्मका मनुष्य दूसरे धर्मवालोंको दुःख पहुँचाता है अपनेको भला तथा सच्चा जानता है। इस पागलखानेसे जिसको सत्ययुग बाहर निकले वे सुख पाते हैं। कबीर साहबने मुहम्मद साबको पाँच कलमे पढ़ाये। वे केवल चार कलमें संसारके निमित्त कहे बाकी एक उनके लिये कहा।

काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादिकी कामनाओंसे यह पागलखाना भरा है। चारों अवस्था जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति तुरीया इनसे तुरीयातीत भिन्न हैं।