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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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अर्थात् अत्यंत क्रोधी वही महासद अरबीमें मुहम्मद हुवा। यह महादेव वही है जिसने सृष्टिके आरंभकालमें पूजा तथा योगमुक्ति संसारमें प्रचलित की। भविष्य-पुराणमें इन्हें एक विप्रकुमार कहा है। जो कि, एक गोलोमके दूधमें पीजानेके कारण ऐसा बनना पड़ा था।

सत्यकबीर—आदिभक्त शिव योगी केली। राखी गुप्त न जगमें फेरी ॥

सांसारिक मनुष्योंको शिवजीने पूजा पाठकी वह युक्ति न बतलाई जिसको वे स्वयम् जानते हैं इसी प्रकार मुहम्मद साहबने अपना यथार्थ भेद किसी मुसलमान को न बतलाया, छिपा रक्खा।

मुहम्मद साहब अरबमें, शंकराचार्य भारतवर्षमें ये दोनों शिवजीके अवतार हैं। इसी शिव तथा विष्णुका धर्म समस्त पृथ्वीपर प्रचलित हुवा करता है। इन्हीं दोनोंका पूजन समस्त संसारमें होता है। ब्रह्माको कोई नहीं पूजता।

कबीर साहबका कथन है कि, एक लाख अस्सी सहस्र पीर पैगम्बर और सिद्ध साधु ऋषि मुनि होगाए हैं। जिन लोगोंने आकर पृथ्वीपर मनुष्योंको उपदेश दिया उनमेंसे कुछ महाशयोंका थोड़ा विवरण मैंने लिखा है। येही सब निरञ्जनके पुत्र तथा दोनों बातोंके माननेवाले हैं। कोई कोई महाशय जैन इत्यादिके समान हैं। जो वेदको नहीं मानते वे भी निरञ्जनके पञ्जेमें हैं। बाहर जानेका किसीको भी सामर्थ्य नहीं हो सकता।

इनमेंसे अनेक महाशय सदैव निर्गुण सगुणकी श्रेष्ठता प्रगट करते आए हैं। चार प्रकारकी मुक्ति और स्वर्ग नरकके दुःख सुख बतलाते आए हैं, इनमेंसे अनेकों को सत्य पुरुषकी भक्तिकी सुध रही है। इन लोगोंको छुटकारे और बंधनका ज्ञान तनिक नहीं बहुत कुछ हुवा है। समस्त मनुष्य वेद तथा पुस्तकोंको पढ़कर मस्त हो रहे। किसीने वेद और पुस्तकोंका वास्तविक तात्पर्य नहीं समझा, बहुत लोग अपनेको वेद और पुस्तकोंके विद्वान् समझते हैं। वह यथार्थमें व्यञ्जन और स्वर से भी अनभिज्ञ हैं। सभी मनुष्य स्वबुद्ध्यानुसार तथा अपने गुरुओंके शिक्षापर मनुष्योंको पथ बतलाते हुए सुकर्म सिखलाते चले आते हैं। परन्तु यह कोई नहीं बतलाता कि, यह पथ निरापत्ति है। यद्यपि समस्त उपदेशकोंका प्रण होता है सभी अपनी २ विद्या तथा बुद्धिके अनुसार लोगोंको मुक्तिका अभिलाषी बनाते हैं। जितने सिद्ध साधु और लिया भविष्यद्वक्ता पृथ्वीपर हुए तथा अब हैं सब निरञ्जन और विष्णु भगवानको परमेश्वर तथा निराकार बनाते आए हैं, पर विना तत्त्व समझे समस्त मनुष्य भटक भटककर चौरासीके बंधनमें पड़े। इनको क्या खबर कि, यथार्थ परमेश्वरकी सच्ची राह कौन है? अथवा किसके पूजनसे आवागमन