कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextदिखाई दिया और नगरमें एक राजा दिखाई दिया था जिसका नाम देवराज था । हमने पूछा यह कौन लोक है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, यह ब्रह्मलोक है । वहाँ एक ब्रह्माका भी दर्शन हुवा जो सनातन ब्रह्मा कहलाता है । तब ब्रह्माने कहा कि, ब्रह्मा तो मैं हूँ यह सनातन ब्रह्मा कहाँसे आया इस ब्रह्माके चहुँ ओर अनेक देवतागण सेवाके निमित्त उपस्थित हैं ? उसको देखकर ब्रह्मा नारदसे कहता है कि, मैं आश्चर्यान्वित हुवा । फिर वहाँसे वह विमान उड़कर एक पल-भरमें कौलासमें पहुँचा । इस पर्वतपर भौंति भौंतिके पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी । सहस्रों प्रकारके पक्षी बोल रहे थे । वीणा इत्यादि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । तब एक क्षणमें शम्भु महाराज इस मकानसे बहिर्गत हुए जो बैलपर सवार थे । उनके तीन नेत्र थे, पाँच मुंह और दश भुजाएँ थीं, उनके ललाटमें चन्द्रमा था, वाघम्बर ओढ़े हुए थे । गणपति जी और वीरभद्र तथा स्वामिकांतिक इनके साथ थे । सहस्रों ब्रह्मा और शंकर आदि इनकी स्तुति करते हुए एवं चँवर इनके शीशपर फिरता हुआ देखा फिर एक पलभरमें वह विमान वैकुण्ठमें जा पहुँचा । इस वैकुण्ठको देखकर मैं परमानन्दित हुवा । वहाँ मैंने सनातन विष्णुको देखा । सहस्रों प्रकारके ब्रह्मा और शिव और इन्द्र इत्यादि देवता देखे उस सनातन विष्णु का स्वरूप अलसीके पुष्पके सदृश दिखाई दिया । शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे हैं लक्ष्मी चँवर कर रही हैं । ब्रह्माजी नारदसे कहते हैं कि, हम दोनों इस माया को देखकर आश्चर्यान्वित हो रहे । वहाँसे विमान उड़कर समुद्रमें पहुँचा । वहाँ सहस्रों प्रकारके कुएँ और बावडियाँ दिखलाई दीं, वहाँका जल अत्यंत मीठा था, सहस्रों प्रकारके वृक्ष और मोती इत्यादिकी खान थीं इस स्थानका नाम मुनिद्वीप था, अनेक प्रकारकी दवाई बूँटी और पुष्पोंकी सुगंधि आरही थी, भँबरे गूँज रहे थे, वहाँके मनुष्य रत्नजटित वस्त्र आभूषण पहने हुए थे और वहाँ एक रत्नजटित पलंग था । उसपर एक देवी बैठी थी । उसकी श्रीवामें सहस्रों प्रकारके रत्नोंकी माला थी, वह सूर्यके सदृश देदीप्यमान थी, वहाँ उसके नेत्रोंका प्रकाश करोड़ों लक्ष्मीके सौन्दर्यके सदृश था और अंकुश तथा त्रिशूल उसके समीप धरा था तथा उस माहामाया का दर्शन करके मैं बड़ा ही सुखी हुआ और सहस्रों प्रकार के रत्नों से जड़े हुए देखे, सहस्रों देवियों उस माहामायाकी सेवा और चँवर कर रही थीं । ब्रह्माजी नारदजीसे कहते हैं कि, हम तीनों उस सनातन आदिमहामायाका दर्शन करके आनन्दित हुए फिर आगे चलकर एक और दूसरी मूर्तिका दर्शन हुवा जो बालकके समान एक बड़के पतेपर लेटा था, बच्चोंके सदृश अपने पावोंका अँगूठा, अपने मुँहमें दिये हुए था, उसको देखकर नितान्तही हर्षित हुए, अपने मनमें सोचा कि, कामनाओंको पूर्ण करनेवाली यही माहामाया है ।