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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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मनुष्यके चार चक्षु हैं; परन्तु पशु चारों चक्षुओंसे अन्धे हैं। यद्यपि उनकी आंखें प्रत्यक्षमें खुली हुई हैं, तो भी वे अन्धे माने जाते हैं। इस कारण कि, वे देख कर भी घातक मार्गसे नहीं टलते। इस कारण वस्तुतः वे मनुष्यके स्वरूपमें पशु ही हैं।

पशुओंको मानवी शिक्षा अच्छी नहीं लगती। जैसे कि, चोर, डाकू, व्यभिचारी इत्यादि सत्संग तथा सत्यपथसे भागते हैं।

सत्यपुरुषके जो अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरुकी शिक्षा सुनकर ऐसे दौडकर मिलते हैं, जैसे कि लोहेसे चुम्बक चिपट जाता है और जो काल पुरुषके जीव हैं उनपर सत्यपथ की शिक्षाका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता हैं।

दान, वीरता, न्याय और धर्म इन चारों गुणोंकी शिक्षा सब लोग करते हैं। परन्तु सत्यगुरुके साथ नहीं करते इस कारण उनकी कामना पूर्ण नहीं होती।

यह कलियुग अत्यन्त कठिन समय है। इसमें मनुष्योंकी रूचि पापकी ओर तो तुरंत ही है। पुण्य से दूर भागती है ऐसी अवस्थामें सत्यगुरुके शरण बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है।

हलालके भोजनसे हृदयकी पवित्रता होती है।

जो कोई न्यायी बादशाहके सामने पाप करेगा और अत्याचारपर कमर बांधेगा तो उसका सत्यानाश अवश्य होगा। ऐसेही जो कोई कबीरपंथमें प्रविष्ट होकर पापकी ओर चित्त लगावेगा तो उसकी दशा बड़ी दीन होगी।

जिसकी सच्ची श्रद्धा अपने गुरुपर है, उसकी बुद्धिपर पिशाचीबल काम नहीं करता, उसकी बुद्धि बदल नहीं सकती, न काल किसी प्रकारकी बाधा ही उपस्थित कर सकता है।

जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा, उसका विश्वास अचल रहेगा, उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी। बिना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान तक करना उचित नहीं है।

कबीरसाहबकी रेखता ।

खलक हैं रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥
कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥
घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे टूटा ॥
ऐसी निर्जनि जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥
सजन परवारा सतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥
निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहिं काम आवेंगे ॥