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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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प्रथम सूक्ष्मवेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया, सृष्टिकी रचना की, तब उसमें की सामयिक बातोंको निकालकर पुरुषमवेद बनाया। इस पुरुषम वेद यथामति समस्त सृष्टिको उपदेश दिया। अज्ञानी लोग इस पुरुषमयानी यानी पराकृत वेदको अपने धर्मका पथ और मोक्षकी सीढ़ी समझने लगे। निरञ्जनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भोजना आरंभ किया। सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वी पर आए। कालपुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए। इन ऋषीश्वरोंमें सहस्रोंने अपनी अपनी नई रीति निकाली। वेदकी शिक्षाको कठिन जान दूसरा पथ बताया। बहुभी कालपुरुषके फंदेमें फँसकर मरे। किसीने बिना पारख गुरुके सत्यलोकके पथको नहीं पाया।

जो कोई किसी जीवका रक्तपात करेगा, उसे उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा। जो कोई किसीको दुःख दे या मांसाहारी हो वह भी निश्चयही दुख पावेगा। अपना मांस उसको खिलावेगा। किसीका प्रतिशोध कोई कदापि नहीं छोड़ेगा।

मांसाहारी और शराबीभी मुक्ति नहीं पासकेंगे। जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं, उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ तथा पवित्र रहना चाहिए।

गृहस्थके लिये अपनी स्त्रीके, छोड़ दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापाप है। साधुके निमित्त विवाहिता अथवा बिन विवाही किसीसे भी संभोग न करना चाहिये।

गुरुकी आज्ञाको न माननेके समान मनुष्यके दूसरा कोई महापाप नहीं है।

सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके लिये सुखदायी है। उसीके शरणमें समस्त पातक क्षमा होंगे। इस कलियुगमें गुरुके प्रति पूरा कर्तव्य पालन कौन कर सकता है। परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है। उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो। जो धर्मविमुख हुआ वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँस ही गया। सत्यगुरुके शरणपर पूरा निर्भर रहे और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेंगे। मेरी ओर नहीं बरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेंगे क्योंकि, उसका नाम पतितपावन है।

घमंडी तथा द्वेषीको कदापि सत्यपुरुषकी भक्ति नहीं होती।

जो मनुष्य बड़ाई और उच्चश्रेणी पाकर नम्र होगा, अपना शीश नवा दिया, धन पाकर दान तथा साधुसेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।

वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, तुच्छ तथा सेवक हूँ। जितनी