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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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कभी किसीसे पूर्णरौतिसे निवह नहीं सकता है। केवल एक नामके बदले तीनों लोकमें कोई वस्तु नहीं है जो दी जावे। गुरुही धर्मकी जड़ है जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं। निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।

कंजूसकी कभी मुक्ति नहीं होती। यह बहुत बड़ा शैतान है, जिसके मनमें घुसता है वह जीवित ही मरा जैसा है, यह एक घृणा उत्पादक लत है। इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है, समस्त पीर पैगम्बर सिद्ध साधु इसको बुरा जानत हैं। किसी प्रकारकी वन्दना सेवा मनुष्य करे पर कृपणता एक ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती हैं। कंजूस सिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।

साखी—कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त।

लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥

साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है, भक्ति मुक्तिकी देनेवाली है। जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता तथा आवश्यकताकी वस्तुओंको इकट्ठा कर देता है उसकी सारी कठिनाइयाँ और पाप दूर हो जाते हैं। साधुओंकी कृपासे सारे पदार्थ प्राप्त होते हैं, साधु सारी युक्तियाँ बतलाते तथा सभी शुभ कार्योंको सिखलाते हैं, नरकसे बचाते, खींचकर वैकुण्ठको ले जाते हैं। ज्ञान एवं मुक्तिकी सारी युक्तियाँ समझाते हैं, समस्त भ्रम और धोखेको दूर कर देते हैं, साधु सत्यपदमें लगाते हैं, साधु संसारके सारे पदार्थोंपर आज्ञा करते हैं, साधु समस्त दुःख संतापको हर लेते हैं। साधुके समस्त पातक पृथक् हो जाते हैं। साधु साहब जुदे नहीं। साधु तो अनेक हैं। परन्तु वह साधु, जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे, सत्यपदमें लगावे उससे विशेष प्रेम करे। उसीकी वन्दना सेवासे हार्दिक कामना पूर्ण होगी। रोटी कपडा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंको दे। मान संमान तो समस्त साधुओंका करना चाहिये। वह साधु जो अपने स्वरूपके मिलनेका मार्ग बतलावे, साधु शिरोमणि वही है। साधुओंकी सेवा तथा आज्ञाका पालन सौभाग्यके चिह्न हैं। बड़े बड़भागी हैं जो साधुओंकी संगति करते हैं। साधुओंको भोजन देनेमें बड़ा पुण्य है। जगत्में उसके समान कोई नहीं है। साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख मिट जाते हैं। जबतक साधुके शरीरपर वस्त्र रहता है, तबतक देनेवालेकी सारी आपत्तियाँ दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बन्धनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई, मनुष्यताकी गतिको प्राप्त न हो। साधुओंकी दयासे मनुष्यधर्म तथा संसारकी सारी विद्याएं और बुद्धि प्राप्त करता है। बहुतेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्यपुरुषकी भक्तिसे भटकाकर कालपुरुषकी भक्तिमें लगा