कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 349 of 1367
Read in contextकबीर साहबके कमालीके मस्तकपर हाथ रखतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया । उसे आरंभसे अन्ततकका सार समयोंका वृत्तान्त प्रगट हो गया । उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौव्वारे छूटने लगे । वो सब वृत्तान्तोंका विवरण करने लगी कन्नसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया उस समय वह ये शब्द बोली कि —
हंसा निकल गया मैं न लडीसी ।
पाँच सहेली संग है मैली, पाँचोंसे मैं अकेली खडीसी
नौ दरवाजे बंदकरलीने, दशबीं मोरी खुली जो पडीसी ।
न मैं बोली न मैं चाली, औठ दोपट्टः किनारे खडीसी ॥
कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥
जी दुनियाँके फन्देसे निकल गया मैं लडी हुई नहीं हूँ, मनकी पाँच वृत्ति ही मैली सहेलियाँ हैं, इस कारण मैं उनके उद्देगको छोड कर उनसे अकेली खडीसी दीख रही हूँ मेरे शरीरके नौऊ दरवाजे समाधि लगानेके लिये बन्द करलेने पर भी दशम द्वार मेरे लिये खुलासा पडा है जब चाहूँ जब उससे शून्य शिखरमें आसन लगालूँ । उस अवस्थामें मेरे संसारके व्यवहार बन्द हो जाते हैं मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर दुनियाँके किनारे खडीसी लगती हूँ ।
इसी प्रकार धर्मदास साहबकी स्त्रीका नाम माई अमीन था । उसके शिर पर कबीर साहबने हाथ रक्खा जिससे उसकी जिह्वासे ज्ञानलोत बहने लगा । एवं वह भी सब वृत्तान्त कहने लगी कि —
साधो नाम सभन से न्यारा लखि पुरन गुप्त विसतारा ।
जानेगा कोई जाननहारा ॥
जब नहिं अंशवंश निर्मायो, नहिं कुछ किया पसारा ।
चर और अचर चार चर नाहीं, नहिं मनको विसतारा ॥
जब नहिं पुरुष नहीं तब ज्ञान, यह मन सबसे न्यारा ।
जब नहिं पाँच अमी निर्माया, नहिं सोहँग विस्तारा ॥
धर ओ अधरधार धर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया ।
तब नहिं कूरम नहिं जलरंगी, नहिं तब जलकी छाया ॥
फुप दीपलीला दहजा हैं, नहिं अदली औतारा ।
करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सब से न्यारा ॥
जब अंश और वंश नहीं बनाया न कुछ संसारकी रचना ही की थी । स्थावर