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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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Page 345

अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ सामना करनेको उद्यत हुए। बड़ा वाद विवाद हुवा। सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगादी। यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते। बात बतापर श्लोकोंका प्रमाण तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते। कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है। यह कदापि न हटेगा। न कहना मानेगा। तब कबीर साहबने कहा कि, ए सर्वानन्द ! अब तुम्हारी क्या कामना है किस बातके इच्छुक हो ? सर्वानन्दने कहा कि, मेरी विजय लिखदे। कबीर साहबने कहा कि, मैं तो लिखना नहीं जानता तुम स्वयम् लिख लो। सर्वानन्दने लिख लिया कि, कबीर साहब हार गए। सर्वानन्द जीत गए। भली भाँति लिखकर यथा वह विजयपत्र कबीर साहब तथा अन्यान्य लोगोंको दिखलाकर अपने घरको चले। आनेपर अपनी मातासे कहा कि, माता मैं कबीर साहबसे वाद विवाद करके उनपर विजय पागया हूँ। तब माताने कहा कि, ए पुत्र ! मुझको तो विश्वास नहीं होता कि तू कबीर साहबपर विजयी हुवा है। सर्वानन्दने कहा कि, मैं विजयपत्र लिखवा लाया हूँ तू देखले। माताने कहा कि कागज निकालो। जब कागज निकाला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि, सर्वानन्द परास्त हो गए कबीर साहब विजयी हुए। यह लिखा देखकर आश्चर्यान्वित हुए कि, यह तो मेराही लिखा था यह कैसा उलटा हुआ। कदाचित् मैं लिखने में भूल गया। मातासे कहा कि, मातः ! मैं लिखनेके समय भूल गया। अब पुनः जाता हूँ अत्यंत सावधानी पूर्वक ले आऊँगा। सर्वानन्द कबीर साहबके पास आए और कहा कि, मैं लिखनेमें भूल गया अबकी बार सँभालकर लिखूँगा। कबीर साहबने कहा कि, भली प्रकार सँभालकर लिखो। सर्वानन्दने उसी विषयको भली प्रकार सँभालकर लिखा। अपनी माताके समीप आकर प्रगट किया कि, अब मैं सँभाल कर लिख लाया हूँ। कागज खोला तो वही पूर्वकी बात लिखी पाई कि, कबीर साहब विजयी हुए तथा सर्वानन्द हार गये। इस प्रकार तीन बार हुए। तब सर्वानन्दको निश्चय होगया, कि, निस्संदेह कबीर साहब ईश्वर हैं। चरणों पर आन पड़े और शिष्य हो गए। कबीर साहब तथा सर्वानन्दका विवरण भिन्न भिन्न स्थानोंमें लिखा है।

एक स्थानपर नवनाथचौरासी सिद्ध कबीर साहब तथा नानक साहब सब इकट्ठे थे। उस समय एक महाजन जो नानक साहब का परिचयी या सेवक था, जा पहुँचा। उसने विचारा कि, सन्त गुरुके समीप बिना कुछ लिए जाना उचित नहीं। कुछ भेंटके निमित्त ले चलना ठीक है। उसने अपनी जेबमें हाथ मारा पर कुछ न निकला। बहुत खोजने पर उसके वस्त्रोंमें एक तिल मिला !