कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहमारे गृहमें साधु मेहमान आये हुए हैं। हमारे पास भोजनके निमित्त कुछ नहीं है अब क्या किया जाय। तब सम्मनने सीवसे कहा कि, अब तो कोई उपाय नहीं, चलो चोरी करें। तब पिता-पुत्र दोनोंने रात्रिके समय एक महाजनके घर सँध लगाया— सीव द्वार तोड़कर भीतर गया, तीन सेर आटा सीधा तीनों मेहमानोंके पेट भरनेके हिसाबसे चुराकर अपने पिताके हाथ धरा, जब आप छेदसे बाहर निकलने लगा यानी जब छेदसे शिर बाहर निकाला, तब पाँव भीतर ही रह गया—महाजनने भीतरसे पाँव पकड़ लिया। सीवने अपने पितासे कहा कि, मैं तो पकड़ा गया। मेरी हुरमत जाती रहेगी। इस कारण तू मेरा शिर काटले, जिसमें मैं न पहचाना जा सकूँ। सम्मनने अपने पुत्रका शिर काट लिया। आटा सीधा और अपने पुत्रका शिर लेकर अपने घर आगया। सीवका शव वहाँ ही पड़ा रहा। सम्मनने अपने बेटेके शीशको एक ताकपर रख दिया। आटा सीधा अपनी स्त्रीको देकर कहा कि, भोजन प्रस्तुत करो परन्तु सावधान, रोना नहीं। यदि रोओ व दुःख प्रगट करोगी तो साधु भोजन नहीं करेंगे। नेकीने तुरन्त भोजन प्रस्तुत किया, सम्मन उन तीनों साधुओंके लिये भोजन लेगया। तीन पत्तल कबीर साहबके सामने रखकर कहा कि, महाराज ! आप तीनों साधुजन भोजन करें। कबीर साहबने तीन पत्तलके छः टुकड़े किये, और छः भाग करके कहा कि सम्मन ! अब तुम अपने पुत्रको बुलाओ हम छः मनुष्य एक साथ भोजन करेंगे, सम्मनने कहा कि, महाराज ! हम तीनों पीछे आवेंगे—आप तीनों संत पहले भोजनकर लें कबीर साहबने कहा कि, ऐसा कभी न होगा, हम सबके सब एक साथ भोजन करेंगे—कबीर साहबने कहा कि, सीव तू कहाँ है, शीघ्र उपस्थित हो, सीवके शीशसे शब्द निकला कि, महाराज ! मैं किस प्रकार आऊ मेरा तो शीश कटा हुवा ताकपर धरा है। और धड़ कहीं पड़ा है। तब कबीर साहबने कहा कि, शिर तो चोरोंके कटते हैं भक्तोंके शीश नहीं कटते। तू चला आ। कबीर साहबके इतना कहतेही सीवका शव आकर मस्तकसे मिल गया। और वह उसी समय जैसा था वँसा जीवित होकर प्रसन्नतापूर्वक कबीर साहबके पास आ बैठ। छः मनुष्योंने भोजन किया, दूसरे दिन बिदा होने लगे उस समय कबीर साहबने कमाल और शेष फरीदसे कहा कि, यहाँसे शीघ्र चलो। कल तो इसने यह कार्य किया आज न जाने और क्या करडाले।
एक बेर कुछ वैरागी जो रामानन्दके चले थे, कबीर साहब सहित अपने गुरुद्वारे दक्षिण देश तोताद्रिको चले। वे जब काशीजीसे चले थे तब एक भँसा भी अपने साथ लेलिया था उसके ऊपर सबने अपनी गुदडी तथा कठारी इत्यादि