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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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हैं—और वे सब अपनी रचनाके रचयिता और स्वामी हैं—वे लोग जगत्प्रभु कहलाते हैं । सांसारिक मनुष्योंमें वह बल और बुद्धि कहाँ है कि, साधुओंके भेदको पहचान सकें । ये बातें केवल सत्यगुरुद्वारा प्राप्त होती हैं जिनके ऊपर पारख गुरुकी दया हो वह इस विषयको जान सकता है—किसी मनुष्यमें इतना पौरुष नहीं । सात स्वर्ग, सात द्वीप, पृथ्वी और नरक—ये ब्रह्माण्डके इक्कीस भाग निरञ्जनके अधीन हैं—सबके ऊपर वह आज्ञा चलाता है । सात द्वीप जो पृथ्वीके हैं उनमें भौंति-भौंति के सुख दुःख हैं—जो सात स्वर्ग हैं उनमें बहुत सुख है—पर वहाँ यह दुःख है कि, एक दूसरे की ईर्षासे जलते रहते हैं स्वर्गके लोगोंकी किसी सीमा-पर्यन्त ज्ञान होता है कि, अब हम स्वर्गसे गिर पड़ेंगे—हमारा सब सुख चला जायगा आपत्तियों तथा दुर्दशाओंमें फँस जायगे इस दुःखसे वे अत्यंत कातरतासे विलाप करते हुए दुःख करते हैं अन्तमें उनका स्वर्गीय शरीर इसी दुःखसे टूट जाता है पीछे वे पृथ्वीपर आकर जन्म लेते हैं जैसे उनके ध्यान होते हैं वे वैसाही चोला पाते हैं । जितने स्वर्ग हैं एवं क्रमानुसार जिस प्रकार एक दूसरेके ऊपर हैं वैसेही उनका सुखभी विशेष होता जाता है । यानी जैसे २ ऊपर हैं वैसेही वैसे सुख तथा आनन्दका आयोजन विशेष होता है—नीचेके विभागोंमें न्यून है । वह सब सुख अस्थायी तथा अल्पकालिक हैं । कुछ समयके उपरान्त स्वप्नके समान भङ्ग हो जानेवाले हैं । सो उन सब स्वर्गों और चारों स्थान जिनको वेदने मुक्तिदाता कहा है—यहाँलों मनुष्योंको ज्ञान होता है—इसके आगे कोई कुछ नहीं जानता । परन्तु कबीर साहबने कहा है कि, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये जो तीनों देवता हैं—वे सहज द्वीप पर्यन्त पहुँच सकते हैं—इसके आगे किसीको तनिक भी सुध नहीं है । तीन देवता सहजद्वीपपर्यन्तकी सुध रखते हैं—परन्तु मनुष्योंको वे नहीं बतलाते—अपना भेद अपने मनमेंही रखते हैं—और भलाई बुराईके समस्त कार्योंका रचयिता निरञ्जन है भलाई करो तो स्वर्ग और वैकुण्ठमें जाय यदि बुराई करे तो नरकमें प्रविष्ट हो—चाहे मृत्युलोकमें जन्म लेता रहै । जैसे आकाशके सुखका विवरण है वैसेही नरकयंत्रणा अत्यंत भयानक है सुतरां मुसलमानी पुस्तकोंमें मैंने पढ़ा था कि, जिस समय हजरत दाऊद नरकमंत्रणाका विवरण किया करते थे—उस समय सुननेवाले बेतरह रोते तड़पते थे । कितनेही भयके मारे मर जाते थे ।

एक बेर नरकयंत्रणाको सुनकर सत्तर मनुष्य भयसे मरगये । स्वयम् दाऊद ऐसा रोता और तड़पता था अचेत हो जाता था । ऐसा हाथ पावें और शिर पीटता था कि, अन्तमें उसे उसकी लौडियाँ और लोग पकड़ लेते थे वह ऐसा विह्वल तथा बेसुध हो जाता था । दाऊद यद्यपि बादशाह था तथापि सारी रात ऐसा रुदन