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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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जिन्ह कलमा कलीमांहि पढ़ाया । कुदरत खोज उनहु नहि पाया ॥

करमत करम करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥

करमत सो जो गरभ औतरिया । करमत सो जो नामहि धरिया ॥

करमत सुन्नति और जनैऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥

पानी पवन संजोयके, रचिया ई उत्पात ॥

सून्यहि सुरत समानिया, कासो कहिये जात ॥

इतनेमें काजी और मुल्लाओंको बिगड़ते देखकर वहाँ भीड़ जम गयी और कितने पक्षपाती हिन्दू भी वहाँ इकट्ठे हो गये, । तब काजीको उसकाने और क्रोधको बढ़ानेके लिये एक हिन्दूने कहा—“क्यों जी कबीर तुमको अपने धर्मका नियम मानना और काजी और मुल्ला जो धर्मके रक्षक और उपदेशक हैं उनकी आज्ञा पर चलना चाहिये । सो काजीजीकी आज्ञानुसार सुन्नत कराकर अपने धर्ममें मिलो । देखो, हमारे यहाँभी जब बालककी जनैऊ होती है तब वह संस्कारी बनता है, जबतक जनैऊ नहीं होती तबतक उसको शूद्रके तुल्य मानते हैं । वैसेही तुम्हारे धर्मका नियम सुन्नत कराना है, उससे क्यों भागते हो !” इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—

जो तोहि कर्ता वरण विचारत । जन्मत तीन दंड अनुसारत ॥

जन्मत सूद्र मुये पुनि सूद्रा । किरतिम जनैऊ घाल जगदुद्रा ॥

जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मनी जाये । और राहासे काहे न आये ॥

जो ये' तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काह न सुन्नति कराये ॥

कारी पीरी दूहौ गार्ई । ताकर दूर देहु बिलगार्ई ॥

छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कबीर भजु सारंगपानी ॥

यह सुनकर वह ब्राह्मण अवाक् होकर रह गया । तब काजीने कहा, देखो यह लड़का शरअसे बाहर बातें करता है इसकी बात सुननी उचित नहीं है । काजीकी इस बात पर उस लज्जित हुए ब्राह्मण और उसके साथियोंने भी जोर लगायी और सब एक मत होकर कहने लगे कि, इस लड़केके कहनेमें क्या आते हो, इसको तो पकड़ कर बांधो और सुन्नत करो । फिर क्या था ? पानीपर चढ़े हुए काजीने कई मांस हारी मुस्टेंडे मुसलमानोंको आज्ञा दिया कि, इस बालकको बांधो । देखतेही देखते थोड़ीही देरमें कबीर साहबको एक रस्सीमें बांधकर उन लोगोंने पछाड़ दिया और नाईकी खोज करने लगे । किन्तु नाई विचारा तो प्रथमही पाँच लिंग देखकर ऐसा भयभीत होकर भागा था कि