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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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गैनी बिना कैसे बनै, मुसलमानकी रीति ।

पीर पैगम्बर रुठिहैं खता खाहुगें मीत ॥

बह सुनकर नीरूने कहा—

नीरू कहै सुनौ रे भाई ! ऐसो करौं तो पूत गवौई ॥

एक बार घर आमिष आना । तेहि कारन सुत भया बिगाना ॥

क्या रुठे क्या खुशी हो, पीर पैगम्बर झारि ।

गौघात में ना करौं, नीरू कहै पुकारि ॥

कबीर साहबके अन्तर्धान हो जानेकी बात तो प्रथमसे ही सबपर जाहिर होगयी थी, इसलिये सब विद्वेषियों और पक्षपातियोंने मिलकर नीरूको बहकाकर उसके द्वारा गोहत्या कराना चाहा, जिससे कबीर साहब नीरूके घरसे रुष्ट होकर चले जावें; तब नीरूकी नामवरी भी जाती रहे और काजी मुलना जो कबीर साहबको अपने धर्मका निकन्दन करनेवाला समझते थे, उनका कांटा भी निकल जावे। किन्तु जब सब जुलाहों तथा काजी मुलनाओंने देखा कि, नीरू तो फन्देमें नहीं आता तब वे एक चाल चले और छलसे कहा—

जोलहन मिली छलसे कह्यो, और करू सब साज ।

नीरू तुमरे कारने, गैनी आयउ बाज ॥

उन लोगोंने अपने मनमें विचार किया कि, नीरूके अनजानमें गाय जबह करेंगे जिसको देखकर कबीर नीरूका घर त्याग देगा। उधर नीरू तो सुन्नतका सामान इकट्ठा करने लगा और इधर मुल्ला काजियोंके साथ मिलकर उसके जाति बिरादरीवालोंने, एक गाय मँगाकर चुपचाप जबह करनेका निश्चय किया। नीरू इस काण्डसे एकदम अजान रहा।

उधर सब सामान दुरस्त हो जानेपर जब नाई छुरा लेकर कबीर साहबका सुन्नत करने गया तब कबीर साहबने लंगूटी खोलकर नाईको पाँच लिंग दिखलाकर कहा, इसमेंसे तेरी जो इच्छा हो सो काट ले। यह आश्चर्य देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया। किन्तु जुलाहों तथा काजीसहित अन्य मुसलमानोंने, अवसर पाकर उसी समय जब नाई कबीर साहबका सुन्नत करने गया, गायको जबह कर दिया। यद्यपि उन दुष्टोंके इस गुप्त काण्डको किसी दूसरेने नहीं जाना, परन्तु अन्तर्यामी सर्वज्ञ कबीर साहबने इस बातको जान लिया। नाईके भाग जानेपर आप बच्चोंके साथ खेलने चले गये थे, सो खेल छोड़ कर वहाँसे दौड़े और गोहत्याके स्थानपर पहुँचकर काजीसे कहा—

हो काजी यह किन फरमाये, किनके मता तुम छुरी चलाये ॥