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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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फँसाकर मार लिया, समस्त मनुष्य भटक-२ कर कालकी फौसीमें पड़ गये । कोई जीव मेरे लोकमें नहीं आता है । मैंने सुकृत (धर्मदास) को सत्यपथके प्रचलित करनेके लिये भेजा था सो उसे भी काल निरंजनने लोक वेदके जालमें फँसा लिया और धर्मदास सत्य पुरुषकी भक्ति को छोड़कर कालपुरुषकी भक्ति और मूर्ति पूजामें लग गया । इस कारण आप पृथ्वीपर जाओ और सुकृतजीको अचेत निद्रासे उठाकर मुक्तिपथ प्रगट करो । बयालीस वंश स्थापित करके पृथ्वीपर थाना जमाओ । तब ज्ञानीजी सत्यपुरुषकी आज्ञा पा और दंडवत प्रणाम करके सत्य-लोकसे बिदा हुए ।

चौतीसवाँ प्रकरण ।

सत्यपुरुषके तेजका लहर तालाब में उतरना ।

सत्यपुरुषके तेज और प्रतापका सत्यलोकसे पृथ्वीपर उतरकर काशी नगरीके लहर तालाबमें ठहरना और फिर उस तेजका मनुष्यके बालक सदृश होकर तालाबके कमलपर स्थित होना ।

सम्बत् चौदहसौ पचपन विक्रमी, ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवारके दिन सत्यपुरुषका तेज काशीके लहर तालाबमें उतरा । उस समय पृथ्वी और आकाश तक प्रकाशित हो गया । उसी समय अष्टानन्दजी वैष्णव उस तालाबपर बैठे थे और वृष्टि होरही थी, बादल आकाशमें घिरे रहनेके कारण अंधकार छाया हुआ था, बिजली चमक रही थी । जिस समय वह नूर उस तालाबमें उतरा, उस समय तालाब जगमग जगमग करने लगा, फिर वह प्रकाश उस तालाबमें ठहर गया । प्रत्येक दिशाएँ जगमगाहटसे परिपूर्ण हो गयीं । इस आश्चर्यमय प्रकाशको देखकर अष्टानन्दजी आश्चर्य चकित हो गये । उस समय उस लहर तालाबमें महाज्योति फँल रही थी. मयूर, चकोर आदि पक्षी बोल रहे थे । चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, पनडुब्बियाँ फिर रही थीं, कमल तथा नीलकमलके पुष्प लहलहा रहे थे, भँवरे गूँज रहे थे । ऐसे समय वह तेज आकर उस तालाबमें स्थिर हुआ । अष्टानन्दजीने जो उस तेजको देखा तो जानकर उसका समस्त विवरण रामानन्द स्वामीसे कहा मुझको अत्यंत आश्चर्य हुआ, उस ज्योतिको आकाशसे उतरते और लहर तालाबमें ठहरते देखा । जब वह प्रकाश उस तालाबमें उतरा तब समस्त तालाब ज्योतिर्मय हो गया । यह बात सुनकर स्वामी रामानन्दजीने अष्टानन्दजीने कहा कि, वह प्रकाश जो तुमने देखा था उसका फल शीघ्रही तुम्हारे देखने तथा सुननेमें आवेगा, उसकी धूम मच जावेगी ।

फिर वह तेज मनुष्यके बालकके आकारमें होकर उस जलके ऊपर कमलोंके