कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 244 of 1367
Read in contextकबीरबचन धर्मदास प्रति ।
सुनत बचन ज्ञानी विहँसायी । चंद्रविजय कहँ बचन सुनायी ॥
करुणामय बचन ।
सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव सबद हमारा माना ॥
ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जो निज माने बात हमारी ॥
पुरुष दर्श निरपति चितलायी । हंस रूप सोभा अति पायी ॥
षोडस भानु रूप नृप पावा । जानु मयंकम ढार बनावा ॥
धर्मदास बचन ।
छंद-धर्म दास विनती करे, जुग लेख जीव सुनायऊ ।
धन्य नाम तुम्हार साहिब, राय लोक समायऊ ॥
तत्व भाव ना गहेस राजा, भगति नारी ठानिया ।
नारि भगति प्रतापते, जमराजसे नृप आनिया ॥
सोरठा-धन्य नारिको ज्ञान लीन्ह बुलाय सु नृपति कहँ ।
आवागमन नसान, जगमें बहुरि न आइया ॥
इति द्रापर युगकी कथा (प्रमाण अनुराग सागर)
इस प्रकार रानीकी भक्तिसे राजा भी पार उत्तर गया—इस द्रापर युगमें सहस्रों बार करुणामय ऋषि प्रगट होते और सच्चे मनुष्योंको अपने लोकमें ले जाते हैं। जो करुणामय ऋषिके उपदेशको ग्रहण करता उसका लोक तथा परलोक दोनों सुधर जगता। जब जब ये तीनों युग आते हैं तब तब आप इन्हीं नामोंसे विख्यात होते हैं। सत्ययुगमें आप सत्यसुकृत कहलाते हैं, त्रेतामें मुनीन्द्र और द्रापर में करुणामय ऋषि अथवा करुणामय स्वामीके नामसे प्रख्यात होते हैं जब कोई जीव सच्चा होता है, तब सत्यगुरु इन नामों द्वारा उसको कृतार्थ करते हैं। यहाँ तक तो तीन युगोंका वृत्तान्त हुआ, अब आगे कलियुगका वृत्तान्त लिखा जाता है। +
- इस कलियुगमें कबीर साहेबके प्रकट होनेकी कथा खूब सुधार और बढ़ाकर अनेक प्रकारसे स्वामी परमानन्दजीने "तालीम कबीर कलजुग" नामक ग्रन्थमें लिखा है। मेरा इरादा था कि, कबीर मन्शूरके इस अध्यायमें उसे पूरा पूरा देवना. किन्तु, कितने अनिवार्य कारणोंसे वैसा कर न सका। सद्गुरुकी मर्जी होगी तो अलगही वह प्रकट किया जायगा।
अनुवादक — श्रीयुगलानन्द विहारी.
<!-- image: Decorative floral separator -->