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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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<!-- image: A circular logo with a gear-like border. Inside the circle, the word 'सत्य' (Saty) is written in Devanagari script. -->

सत्यमेव जयते नानृतम्

<!-- image: A small five-pointed star symbol. -->

प्रथम ब्रह्मसूत्र

हंसोंके प्यारे भक्तों के जीवन सर्वस्व सत्य साकेत लोकवासी परब्रह्म परमात्मा पुरुषोत्तम, श्रीसत्यपुरुषकी अहेतुकी दया, अबिल ब्रह्माण्डोंके सभी जीवोंपर सदा बनी रहती है।

यद्यपि जीव क्षण २ में और का और होनेवाले असार भवसागरके चंचल तरंगोंके प्रबल वेगसे इतस्ततः बहता हुआ, मायाके गहरे भँवरमें फंसकर, पुत्र दार गृह्णादिके झूठे अभिनिवेशसे तेरा मेरा करता हुआ सच्चे स्वामीको भुला, झूठे मोहोंमें मुग्ध हो जाता है पर वो सच्चा प्रेमी अपने अनुकम्पोंका कभी विस्मरण नहीं करता प्रतिक्षण इन्हीं चिन्तामें रहता है फिर उन भक्तोंकी तो बात ही दूसरी है जो सारे विश्वको उसीकी चरण रेणुके एक कण पर न कुछकी तरह निछावर किये बैठे हैं।

स्वर्ग, नरक, उच्च, नीच, पौर्यात्य, पाश्चात्य, हिन्दू, अहिन्दू सर्वत्र उसका सहज प्रकाश सदा पहुचा करता है। यादृश कर्मफलोंको भोगनेके लिये जैसे साधनोंकी आवश्यकता होती है वो बिना किसी प्रार्थनाके अपने ही आप वैसे ही साधन दे देता है जिनसे कि, प्रारब्ध भोगोंको भोगनेमें समर्थ होसके। जो जिस देशका रहनेवाला है उसे उसी देशके अकटक निर्वाह करनेके सब उपकरण प्रदान कर दिये हैं। शीत देशके जन्मे हुओंको वहाँके अनुकूल तथा गर्म देशोंके रहनेवालोंको गरम सह सकेके योग्य बनाया है।

यह ईश्वर की सहज दयाका ही फल है। उसीकी दी हुई शक्तिसे सब शक्तिवान् बन रहे हैं। जिसमें जो स्वाभाविकता दीखती है सब उसीकी दी हुई है; इसीसे यह अनुमान, सहज ही में लगाया जा सकता है कि, सब पर उसकी अहेतुकी दया है सबका वो सच्चा प्यारा है उसका किसीसे द्वेष नहीं है। वो कितने भूलें तथा द्वेष भी किससे करे उसीके लोकका प्रकाश जो चैतन्याकाश पर पड़ा वही तो समष्टि जीव है उससे इतर योड़ाही है यही साहिवसे विमुख होकर संसारी बना है पर साहिव इससे कभी भी विमुख नहीं होता जो कि इसे भूल जाय।

इसीने देव देवी बनकर देव लोक, नाग नागिन होकर पाताललोक, किन्नर किन्नरी बन कर किन्नर लोक, यक्ष यक्षिणी बनकर यक्षलोक वम् मानुष एमानुषी बनकर मनुष्य लोक भर दिया है। मनुष्यों में भी कोई राजा कोई प्रजा कोई धनी, निर्धन, कोई निर्बल सबल, कोई पूज्य, अपूज्य एवं कोई ज्ञानी तथा कोई अज्ञानके घोर तममें पड़ा ठोकरें खा रहा है।

जो जो जीवोंका स्वभाव बन्धनोंमें बँधनेका होता जाता है त्यों २ वो अपनी तरह खींचनेके लिये हाथ बढ़ाता जाता है। जीव मार्गभूल कर गड़बोंकी ओर भगे जा रहे हैं तो वो उन्हें मार्गपर लानेका प्रयत्न कर रहा है।

संसारी व्यवहारोंको अच्छी तरह जतानेके लिये, इसके व्यवहारोंका सुखपूर्वक पालन करनेके लिये एवम् बिना किसीके सताये आनन्द पूर्वक रहते हुए आगे बढ़नेके लिये, अपरा विद्याका