कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextपुष्पाञ्जलि
जिस महापुरुषने भूमण्डल पर आकर धर्मद्वेषसे दग्ध हुए जीवोंको सामान्य धर्मरूप अमृत पिलाकर सजीव किया इस ग्रन्थकी पहिली भेंट उसी श्री कबीर साहिब के चरणोंमें की जाती है।
दूसरी भेंट—कबीर पन्थके संस्थापक श्रीधर्मदासजी तथा उनके व्यालीस वंशको है जिन्होंने आजतक साहिबके सिद्धान्तोंकी रक्षा करते हुए उन्हें कार्य रूपमें परिणत किया।
तीसरी भेंट—उनको है जो इस खींचातानीके समयमें भी अपने पन्थको कबीर साहिबकाही एक पन्थ समझते हैं।
चौथी भेंट—इस पन्थके उन सन्त महन्तोंको है जो इस कराल कलिकालकी चपल तरंगोंके झोंकों को बारंबार सहकर भी साहिबके बताये हुए पंथ पर दृढ़ हैं जो कि कबीर साहिबकी वाणीका सच्चा तात्पर्य समझते हैं।
मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मोर ॥
माधवाचार्य।