कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextलगा जाते हैं और अपने प्राणको खींचकर वशवें द्वार पर पहुँचा देते हैं, वहाँ पर कालकी पहुँच नहीं होती। वे जाने रहते हैं कि, कितने समय पर्यन्त मृत्युका आक्रमण है, उतनी देरतक प्राणको नीचे नहीं उतारते और जब मृत्युका समय जाता रहता है और काल निराश होकर पलट जाता है, तब फिर अपने प्राणको नीचे उतारते और फिर प्रसन्नतापूर्वक निर्भय होकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार साधु लोग मृत्युसे बचते हैं और काया कल्प करके बुढ़ापे तथा निर्वलताको दूर करते हैं।
नवों प्रकरण ।
निरञ्जनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार करना ।
इसी प्रकार निरञ्जनने बहुत कुछ माँगा और कबीरसाहबने उसको दिया तब धर्मराजने उठकर कबीरसाहबको दंडवत् प्रणाम करके कहा कि, जो जो मनुष्य आपका आज्ञाकारी होगा और आपकी भक्ति और स्तुति करेगा तथा आपका पान पावेगा उसके समीप मैं कदापि नहीं जाऊँगा, शेष लोक तथा वेदके सब जीव मेरे अधीन रहेंगे, इसके अतिरिक्त कितनी बातें हुईं सो यहाँ थोड़ासा लिखा है। धर्मराजने अपने लोकमें रहे और कबीर साहब पृथ्वीको चले, जब आप पहले पृथ्वीपर आये उस समय सत्ययुगका समय था।
यहाँ पाठकोंकी आसानीके लिये निरञ्जनगोष्ठी दे दिया जाता है—
निरंजन गोष्ठी ।
अर्थात् सत्य लोकसे जीवोंको बचानेके लिये ज्ञानीजी (कबीर साहब) का पृथ्वीपर आते समय निरंजनसे बातलाप ।
ज्ञानी वचन ।
काल निरंजन निरगुनराई । तीन लोक जिहि फिरी दुहार्ई ॥
सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥
ब्रह्मा विस्तु और सिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
चित्रगुप्त धरम बरियारा । लिखनी लिखें सकल संसारा ॥
चौरासी लाख अरु चारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पसु पंछी जल थल विस्तारा । वन परवत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सबपर छाया । पुरुष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसेही चल गयेऊ । पुरुष शब्द एक चितमें ठयेऊ ॥