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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्माका विष्णुके पास जाकर
अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना ।
ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विस्तुके पास ॥

ब्रह्मावचन विष्णु प्रति ।

जाय विस्तुसे विनती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥
तुम पर माता भई दयाला । साप विवश तुम भये बिहाला ॥
निज करनी फल पावउ भाई । किहि बिधि दोष लगाऊँ माई ॥
अब अस जतन करो हो भ्राता । चल परिवार वचन रह माता ॥

विष्णुवचन ।

कहे विस्तु छोडो मन भंगा । मैं करिहँ सेवकाई संगा ॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संसय सब देहु बहाई ॥
जो कोइ होवे भगत हमारा । सो सेवै तुम्हरो परिवारा ॥
छंद—जग माहि ऐसे दिढाइहँ फल पुन्य आसा जोय हो ॥
जज्ञ धर्म अरु करे पूजा द्विज बिना नहि होय हो ॥
जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुन्य प्रभाव हो ॥
सो जीव मोकह अधिक प्यारे राखिहों निज ठाँव हो ॥ ३१ ॥

कबीरवचन धर्मदास प्रति ।

सोरठा—ब्रह्मा भये आनंद, जबहि विस्तु अस भासेऊ ॥
मेटेउ चितकर दुंद, सखा मोर सब सुखीभौ ॥ ३२ ॥

काल प्रपंच ।

देखहु धर्मान काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥
आसा दै जीवन बिल मावै । जनम जनम पुनि ताहि सतावै ॥
बलि हरिचंद बेनु बइरोचन । कुंती सुत औरो महिसोचन ॥
ये सब त्यागी दानि नरेसा । न कहूँ लै राखै केहि देसा ॥
जस गंजन इन सबकी कीन्हा । सो जग जाने काल अधीना ॥
जानत है जग होय न सुद्धी । काल अमरबल सबकी हर बुद्धी ॥
मन तरंगम जीव भुलाना । निज घर उलटिन चीन्ह अजाना ॥

धर्मदासवचन ।

धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समझाई ॥
तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निस्वय तुम्हरे पद चित दीन्हा ॥