कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 1365 of 1367
Read in contextग्रन्थकर्त्ताका अन्तिम निवेदन ।
पाठक गणोंसे निवेदन है कि, दासने यह पुस्तक स्वसम्बेदके अनुसार लिखी है, जिस किसीका मन चाहे कबीरपंथके विद्वानोंसे विचारकरके निश्चय करले। यदि कहीं प्रमाणादिकोंमें कुछ सन्देह अथवा भेद जान पड़े तो कृपा दृष्टिसे मुझे क्षमा करें क्योंकि, मनुष्य जीवनही भूलसे पूर्ण है।
पुस्तक समाप्तिकी तिथि ।
शुक्र बेहद परम गुरु गोविंद । की सरनजाम नुसखये दिल बन्द ॥
करमो फजल उसपै सतगुरुका । जो समझकर पढ़े सुने यह पन्द ॥
इससे शीरीं न कोई शर्बत और । आब हैवों न शूर्ब मिस्त्री कन्द ॥
पाव पहचान जो कोई मुशिदको । हो दफा सब जहाँका दुख दन्द ॥
कर अमल गर निगर न चश्म अपने । राज महरम न हो तो बर मन खन्द ॥
ईस्वी सन अठारह सौ अस्वन । उनीससौसैंतीस बिक्रमाँ सनः हिन्द ॥
मिहर सितम्बर व हिन्दवी अस्वन । खतम तारीख नुसखये चारम चन्द ॥
मैं उसीका हूँ खादमाँ खादिम । जिसके दरगह न पहुँचे कोई परन्द ॥
आजिज बा तख़लुस आजिज । नाम जिसका है दास परमानन्द ॥
है कबीर मन्सूरका, यह अविकल अनुवाद ।
विषम विषय निरधारिके, “माधव” रच्यो अवाद ॥
साहब ग्रन्थन सिन्धुमें, मो मन दुवकी लीन ।
सारशब्द हीरा अजब, तहँते लायो वीन ॥
बुद्धि अनौते भेदि तेहिं, ज्ञान सूत्रमें पोह ।
सन्त पारखिनके गरे, ग्रन्थमाल यह सोह ॥
यदि यह माला धारिके, सन्त भजहिगे राम ।
तो सब सिद्धी शान्ति सुख, पैहँ माधवनाम ॥
श्री कबीर पन्थी स्वामी परमानन्दजी साधु विरचित उर्दू कबीर मन्शूरका संशोधन तथा परिष्कार पूर्वक, सर्व तन्त्र स्वतंत्र भक्तों के चरण रज रिसर्च स्कॉलर पं० माधवाचार्य परिकृत हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ ।
पुस्तके मिलने के स्थान :-
१. इंदमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीमं०