कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
Page 135 of 1367
Read in contextमठ, भूरीबार सम्प्रदाय, १ सरस्वती, २ भारती, ३ पुरी तीन पद, क्षेत्र रामेश्वर, आदिवाराह देवता, कामाक्षा देवी, भृङ्गी ऋषि, पृथ्वीधराचार्य, तुङ्गभद्रा तीर्थ, यजुर्वेद, बृहदारण्य उपनिषद्, ब्राह्मण, इच्छाविष, अहम् ब्रह्मास्मि महावाक्य, अर्धमात्रा ।
इकहत्तरवाँ प्रकरण
शांकरी सम्प्रदायसे मिलते और पंथ ।
शांकरीसम्प्रदाय जो संसारमें है, इनमें ये उपयुक्त दश नामके सन्यासी हैं, और बारह पंथके योगी हैं, शिवधर्ममें यही लोग बड़े हैं, ये सब लोग शिवजीको अपना गुरु तथा आचार्य मानते हैं—इन समस्त सन्यासियोंमें भी दो सन्यासी सबसे श्रेष्ठ हैं, एक दंडी और दूसरे दिगम्बरी, इन दोनोंकी चालचलन अच्छी है और मद्यमांस आदि बुरे खाद्य तथा घृणित कार्योंसे बिलकुलही पृथक् रहते हैं । इनके अतिरिक्त और कितनेही सन्यासी और योगीभी अपने आचरणको विशुद्ध रखते हैं, किन्तु कितनोंके आचरण ठीक नहीं, मांस मदिरा तथा श्मश्रि २ के घृणित पदार्थोंको व्यवहारमें लाते हैं । वाममार्गी तथा अघोरी इत्यादि इन्हींमें होते हैं और खूनी वस्त्र, अर्थात् गेरुवा वस्त्र इन्हींके निमित्त उपयुक्त है । और खप्पर समुद्रीय पशुकी खोपडी तथा मनुष्यकी खोपडी भी यही अघोरी लोग रखते हैं । उसीमें वे खाते और पानी पीते हैं, इनमेंसे कोई २ मूत्र पुरीष तथा अन्यान्य घृणित वस्तुओंको भी खाया पीया करते हैं। ये भी और शिवभक्तिके पंथका प्रचार करते हैं । इस वेषमें जाति पाँतिका कोई ध्यान नहीं है, कारण यह कि, अद्याका वचन हो चुका था कि, हे शिव ! तेरा वेष भयानक होगा, और तेरी जाति पाँतिका कोई ठिकाना नहीं रहेगा, तू बड़ा क्रोधी होगा । वैसाही रङ्ग ढङ्ग सन्यासी आदिकोंमें प्रगट है । शिवजी तमोगुणी देवता विष्णुके अधीन हैं, इस कारण शिवसम्प्रदायके लोग विष्णुसम्प्रदायके अधीन हैं । शिव लोग जो अत्यंत परिश्रमके साथ भक्ति करते हैं वे कौलासको जाते हैं, शिवजीके सेवक प्रायः भूत, प्रेत, राक्षस इत्यादि हैं, जो अनेकानेक कुकर्मोंमें डूबे रहे हैं ।
यह तमोगुणी देवता उत्पत्तिकी प्रवाह स्वरूप हैं, स्वयम् अद्या शिवके साथ रहती है, जैसा कि, मैं पहले लिख आया । देवीभागवत और कालीपुराण इत्यादिमें इस अद्याकी बहुत बड़ाई लिखी गई है । इसी अद्याको उसके सेवकगण संसारकी रचयिता जानते हैं और कहते हैं कि, इससे बडी और कोई नहीं है, इसीसे उत्पत्ति स्थिति और परलय हुआ करती है ।