कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसतकबीर वचन शब्द ।
वाह वाह लड़के जीता रह, वाह वाह लड़के जीता रह ।
मँडुवीकी रोटी वथुईकी भाजी, ठंढा पानी पीता रह ॥
प्रेमकी सुई सुरतिका धागा, ज्ञान गुदड़िया सीता रह ॥
इस लड़केकी बड़ी २ अँखिया, निशिदिन दर्शन करता रह ।
कहैं कबीर सुनो हो नानक, राम रसिक रस पीता रह ॥
सर्व हंस सदा इस सत गुरुकी प्रशंसा किया करते हैं। उसकी प्रार्थनासे बढ़कर दूसरी कोई बातही नहीं समझते। जैसा कि, गरीबदासजी कहते हैं कि —
ऐसो ख्याल विशाल सतगुरु अटल दिगम्बर थीर है ।
भक्ति हेतु काया धराये अविगत सत्य कबीर है ॥
नानक दादू अगम अगादू तेरे जहाजके खेवट सही ।
सुख सागरके हंस आये भक्ति हिरम्बर उर गही ॥
कोटि भानुप्रकाश पूरन रूप रोम रोमकी लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अविगतिका दीदार है ॥
धन्य सत्यगुरु उपदेश देवा चौरासी भ्रम जो मेट है ।
तेज पञ्चतन देह धारिके इस विधि हमको भेंट है ॥
शब्द निवास आकाश वानी यह सतगुरुका रूप है ।
चन्द सूरज पवन पानी जहाँ नहीं छाया धूप है ॥
रहता रमिता राम साहब अविगत अल्लह अलेख है ।
भूले पन्थ विडम्ब वादी कुलका खाविन्द एक है ॥
रोम रोमसे जाप जपले अष्ट कमल दल मेल है ।
सुरति निरतिको कमल बैठो जहाँ न दीपक मेल है ॥
हरहम खोज हनोज हाजिर त्रिवेनीके तीर है ।
दास गरीब तबीब सतगुरु वन्दी छोर कबीर है ॥
नानक शाहू साहबको कबीर साहब नदी पर मिले, इसी कारण सिक्ख नदीको पूजते हैं उसको गुरु दरिया बोलते हैं। यथार्थ गुरुको भूल गये दरियाको पूजने लगे। नानक शाहूने कबीर साहबको बाहगुरु कहा सो तो सिक्ख लोग उस बाहगुरुको भूल गये अपना मन माना अर्थ कहना आरम्भ किया।
वा (वासुदेव) ह (हरि) ग (गोविन्द) र (राम) ये चार नाम ईश्वरके माने। सत गुरु कबीरके बिना कोई भी बन्धन नहीं काट सकता, चाहे कोई सहस्रों प्रकारकी बुद्धिमानी क्यों न करे।