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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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निर्भव-भव नाम भव सागरका है। उनचासकोटि योजन विराट पुरुषका शरीर है। उसीमें ये तीन लोक बसे हैं उसीका नाम भवसागर है यही उत्पत्ति सागर है। इसीके मध्य सब जीवधारियोंका आवागमन होता है। निरञ्जन भवरूपही है और भवादि उद्भवका अर्थ उत्पन्न होना है जन्म मरण सदा इस ओंकारके देहके अन्तर होता है। यह तो असत नामकर्ता पुरुषका हास है जिसके प्रेममें पड़ा हुआ बारम्बार बन्धनकोही पाता है। सत नामकर्ता पुरुष निर्भव है कोई उससे मिलता है वह भी निर्भव हो जाता है, उसका आवागमन कभी नहीं होता। वह परमानन्द पदको प्राप्त होजाता है।

निर्वैर - वह सत नामकर्ता पुरुष निर्वैर है वह किसीसे शत्रुता नहीं रखता। वह सब जीवधारियोंका समान मित्र है। उससे बढ़कर जीवधारियोंका दूसरा हित चिन्तक नहीं है। जब दैत्यों और राक्षसोंकी अधिकता होती है तो वो शरीर धरकर उनसे युद्ध करता है। यह असत नाम कर्ता पुरुष छल कपट और वैर विरोधसे पूर्ण है। सत नाम कर्ता पुरुष अपनेसे विरोध माननेवालोंका भी मित्र है।

अकालमूर्ति - अकालमूर्ति इस लिये कहा, कि वह पूर्ण दयाकी मूर्ति है। उस मूर्तिके भयसे काल दूर भागता है। वह अकालमूर्ति सबका सुख देनेवाला है। कालमूर्ति दुःख देनेवाला है।

अयोनी - अयोनी उसको कहते हैं जो कभी मातृगर्भमें कंद न होवे। सो सत नामकर्ता पुरुष अयोनी है। असत नामकर्ता पुरुष सयोनी है। चार खानि चौरासी लाखयोनि असत नामकर्ता पुरुषसे उत्पन्न हुए हैं, वही योनिकी इच्छा रखता है, उसको आवागमन होता है सतनाम कर्ता पुरुष न कभी कामातुर होता है, न कभी मातृगर्भमेंही आता है।

सइमं - पञ्जाबी भाषामें सई और सेवकका अर्थ सखी और सहेली है। पूर्वी भाषामें सईका अर्थ अधिकता और विशेषता है। भ्रमका अर्थ यहाँ अर्थात् प्रगट होना। यह सतनाम कर्ता पुरुषकी प्रशंसा है अर्थात् तू पहले एक था अब अनेक हो गया। मन और इन्द्रिय आदि सब तुमसेही प्रगट हुये हैं। तू इन सबसे मिला भी है अलग भी है। सतनाम कर्ता पुरुषमें दोनों गुण हैं, सबमें मिला एवं सबसे अलग योग और भोग दोनोंमें एक सम रहता है। वह आग जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई है यदि वह उसमें भी न हो तो उसका कुछ ठिकाना न हो। सतनाम कर्तापुरुष अविनाशी है असत् नाम कर्ता पुरुष विनाशी है।

गुरु प्रसाद - नानक साहब कहते हैं कि, जो सतनाम कर्ता पुरुष है वो गुरुकी दयासे जाना जाता है, जिसपर गुरुकी कृपावृष्टि होती है वह उसका