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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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पशु और प्रेत मगधको तारे, बाहन पार उतारे ॥

नानकदास तेरी शरनाई, सदा सदा वलिहारे ॥

इस शब्दके ऊपर ध्यान दो विचार करो कि, यह किसके विषयमें है। इसी पुस्तकमें लिखा है कि कबीर साहबने कुत्तेके बच्चेको प्रथम वादशाह बना दिया फिर मोक्ष दी। इसी प्रकार अनन्त भूत, प्रेत, मूर्ख, पापी अत्याचारी हत्यारे आदिकको ज्ञान देकर उसका बुरा कर्म छोड़ा मोक्ष पद दिया। राजा कनक जो हाथी बन गया था उसको भी मुक्त कर दिया। उसीमें पशुओंको भी मोक्ष देनेकी सामर्थ्य है। उसीने रामचन्द्रके लिये पानीपर पत्थर चलाया था।

जिनको कालपुरषने अन्धा कर दिया, जिनके माथेपर असत्य आत्माने वासा लिया, वे गुरुसे विमुख होगये।

नानक साहबने अपने गुरुकी आज्ञानुसार सत पुरुषकी भक्ति प्रचलित की थी, उनको नयाग्रन्थ और नयी बानी बनानेकी कुछ आवश्यकता न थी। क्योंकि, केवल स्वसंवेदही सब हंस कबीरोंके लिये यथेष्ट है। यदि नानक साहबने कोई ग्रन्थ बनाया भी हो तो अब उसका ठीक २ पता नहीं है।

नानकसाहबने अपने जीवनमें कबीरसाहबकी ही आज्ञाको प्रचलित रखा पर उनके पीछे उनके स्थानापन्नोंकी समझमें भ्रम और भेद होने लगा। पाँचवें गुरु अर्जुनजीका समय आया तो उनने गुरु ग्रन्थ बनाया कबीर गुरुको एकदम छोड़ दिया। नानकसाहबको तो गुरुके स्थानापन्न माना, कबीर साहबका नाम भक्तोंमें मिलाकर लिखा। चार पीढ़ी तक तो बात सन्देहमें रही पर पाँचवीं पीढ़ीने प्रगट करके स्पष्ट कह दिया।

इन लोगोंने कबीर गुरुसे विमुखता स्वीकार की तब सांसारिक वासनाओं ने अन्तःकरणमें लहर मारी। छठे गुरु हरगोविन्दने युद्धकी सामग्री इकट्ठी कर लड़ाई भिड़ाई प्रारम्भ करदी। फिर तो क्रमशः होते होते गुरु गोविर्दाससिंह के समय समयमें जो रंग हुआसो सबपर प्रगट है।

जब इस प्रकार सतोगुणी धर्म जाता रहा, भाई रामसिंह कोकाने फिरसे सतोगुणी चालको प्रचलित किया। यद्यपि प्रगटतो उनका व्यवहार कबीर साहब के अनुसार रहा पर उपासनामें भेद पड़ गया। क्योंकि, उन्होंने कबीर साहबको नहीं बरन् गुरु गोविर्दाससिंहको अपना आचार्य माना। इसी कारण सत पुरुषकी भक्ति और स्वसंवेदकी यथार्थ शिक्षा प्राप्त नहीं हुई इसी कारण उनमें भेद रह गया। यद्यपि बाहिरी क्रियामें वैसेही संयम करते हैं जैसे कबीर पन्थी, पर उपासना भेदके कारण अंतर भेद रह गया है।