कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context६० प्रश्न—एकदेशी और सर्वदेशीका निर्णय, ब्रह्मको सर्वदेशी सम कहते हैं इस कारण सब धर्मोंमें समान है ही। कबीर साहब और पारख गुरुको बिना दूसरे स्थानमें न मिलेगा तो सर्वव्यापी और सम नहीं हुआ ?
उत्तर—निःसन्देह वह सब धर्मों, सब स्थानों और सभी पदार्थोंमें समान भावसे व्यापक है। आत्मा चारों खानिमें एक समानही व्यापक है उसमें न्यूनता अधिकता नहीं पर जहाँ जिस रंगमें होता है वही उसका रूप हो जाता है जैसे सब जीवधारियोंमें एकही आत्मा है तो भी मनुष्य शरीरबिना पूर्णता किसीको प्राप्त नहीं होती ; इसी प्रकार सर्वव्यापक होनेपर भी पारखगुरु बिना ब्रह्मका जानना असम्भव है। जैसे स्फटिकमणिके निकट जैसा फल पड़ा हो जैसाही प्रतिबिम्ब उसमें पड़ेगा, जैसा रङ्ग उसके सन्मुख होगा वह उसी रङ्गका बन जावेगा। इसी प्रकार शुद्ध आत्मामें नाना कर्मोंका नाना रङ्ग चढ़ रहा है। एक रङ्ग हटा दूसरा आ उपस्थित हुआ जब तक सद्गुरु इन कर्मोंका धोका न अलग करे तब तक शुद्ध नहीं हो सकता।
६१ प्रश्न—भक्ति करनेयोग्य और बन्धमुक्त—किसकी भक्ति करनी चाहिये।
उत्तर—जो कर्मोंके जालसे निकला हो जिसके ऊपर कर्मका बल न हो उसकी भक्ति करनी चाहिये।
६२—प्रश्न—आप समझाकर कहिये कि, कौन बद्ध और कौन मुक्त है ?
उत्तर—वेद जिसकी प्रशंसा करता है जिसको किताब वर्णन करते हैं वही बद्ध है। स्वसंवेद जिसको कहते हैं वही मुक्त है उसीकी भक्ति करनी चाहिये।
६३ प्रश्न—किस प्रकार सत्पुरुषकी भक्ति करनी चाहिये ?
उत्तर— सत्पुरुषकी भक्ति कामना रहित होकर करनेसे फलदायक होती है।
इसीपर एक कथा—एक गाँवमें एक साधु रहा करता था। उसके पास एक वृक्ष था जिसके नीचे मूर्तिपूजा हुआ करती थी देखते देखते उस साधुको बहुत क्रोध चढ़ा, कुल्हाड़ी लेकर वृक्षको काटने चला। मार्गमें एक मनुष्य मिला, उसने पूछा कि, कहाँ जाते हो महाराज ? साधुने कहा कि, मैं उस वृक्षको काटने जाता हूँ। उसने मना किया पर साधुने नहीं माना। दोनों में मल्ल युद्ध होने लगा ; साधुकी जय हुई। साधुने मनुष्यको पछाड़ा। फिर उस आदमीने कहा कि, यदि तू उस वृक्षको न काटे तो तुझे मैं नित्य पांच सुवर्ण मुद्रा (अशरफी) दिया करूँगा। वह साधु इस बात पर सहमत हुआ, वृक्षको काटना छोड़के अपने घर