कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context४८ प्रश्न—वेदान्ती और कबीर पन्थियोंमें भेद, आपने वेदान्तियोंको असत्यवादी कहा है पर आप भी तो उन्हीके समान वचन कहते हैं भेद क्या हुआ?
उत्तर—वेदान्तियोंका वचन तत्त्वमसिके अन्तर्गत है इसी कारण मिथ्या है, हमारा कहना तत्त्वमसिसे बाहर है जिसका ज्ञान उनको नहीं है।
४९ प्रश्न—चर्मचक्षुसे देख, लाभ न पाया, आपने कहा था कि, ईश्वर शारीरिक आँखोंसे देखा नहीं जाता, जो बाहरकी आँखोंसे देखा जाता है वह मिथ्या होता है, तो कबीर साहबको भी तो लोग आँखों से ही देखते थे ?
उत्तर—हो, जिन लोगोंने कबीर साहबको बहिर दृष्टिसे देखा, अन्तर दृष्टि रखते नहीं थे उनको कुछ लाभ नहीं हुआ।
५०—प्रश्न—शत्रु, मित्र, सर्वका कर्ता ईश्वरही है, मनुष्यको भी कुछ अधिकार है ?
उत्तर—आपमें ईश्वर है, ईश्वरमें आप हैं। जिसने सबमें ईश्वरको देखा उसने कर्तापिनेका अहंकार छोड़ दिया। मूर्ख लोग कहते हैं—ईश्वरने मेरे ऊपर आपत्ति डाली। यदि ऐसे मूर्खोंसे पूछो कि, ईश्वरको तेरे साथ क्यों शत्रुता हुई तो कहेंगे कि, “मैंने अमुक पाप कर्म किया था” इससे प्रमाणित होता है कि, कर्मही मित्र और शत्रु है।
५१ प्रश्न—नाम रूपसे छूटनेका मार्ग, नाम रूप सब मिथ्या और भ्रम है फिर किसका भजन ध्यान करना चाहिये ?
उत्तर—नाम और रूप दोनों निःसन्देह अनित्य हैं। इसके आगे गुरुकी कृपासे जाना जाता है। जब नाम रूप दोनोंही मिथ्या हैं तो फिर हम तुम कैसे सत्य हो सकते हैं ? इस कारण असत्यको असत्यके साथ मैत्री होनी ठीकही है। इससे यह प्रमाणित होता है कि, नाम और रूपका भजन करना चाहिये। जब नाम रूपके परेका विचार होगा तब ये आपही छूट जावेंगे।
५२ प्रश्न—ब्रह्माण्ड दर्शन, कबीर साहबने केवल महम्मद साहेबकोही ब्रह्माण्डोंका भ्रमण कराया कि, किसी औरको भी ?
उत्तर—करोड़ों अगिनित मनुष्योंको लोक दिखलाया जिसका कि, हाल कबीरपंथकी पुस्तकोंको पढ़नेसे जान पड़ेगा।
५३ प्रश्न—न्याय और दया एक साथ, ईश्वरको न्यायी और दयालुभी कहते हैं, दोनों गुण एक साथ कैसे रह सकते हैं ?
उत्तर—दो बात एक साथ इस प्रकार रह सकते हैं कि, जैसे न्यायने जो अबल पक्षादि पक्षियोंको दुखमें डाल दिया, प्रभुकी दयाने उस दशामें भी उसके