कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextहै। सारा संसार शून्यसे हुआ है, यह पूर्णतया शून्य है। शून्य अथवा माया मिथ्या निर्मल है।
२३--प्रश्न-मुक्तपदका निर्णय, आदिमें कुछ नहीं था, अन्तमें भी कुछ न रहेगा, फिर मुक्ति किसको होती है ?
उत्तर--प्रथम कुछ न था इसका अर्थ यह है कि, प्रथम भ्रम (अज्ञान) न था। जब भ्रम उत्पन्न हुआ तो समस्त सृष्टि उत्पन्न हो गई, जब भ्रम न रहेगा तब सब नष्ट होजावेगा भ्रमके नष्ट हो जानेपर जो शेष रह जाता है वही मुक्त पद है।
२४ प्रश्न--जीवका ईश्वरांश होनेका निर्णय, जीव ईश्वरका अंश है तो चाहिये कि, एकके सुख दुःखसे सबको सुख दुःख हो ?
उत्तर--सर्व जीवधारियोंके अन्तःकरणमें ज्ञानका आवरण होगया है इस हेतु सबको सुख दुःख भिन्न २ प्रतीत होता है। जिसका भ्रम नष्ट हो गया उसको सर्व अन्तःकरणोंपर अधिकार होजाता है। जीव ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, ईश्वर अविभाज्य और अखण्ड है वह निकट भी नहीं और दूर भी नहीं। जिस प्रकार एकही सूर्य है पर अनेक घड़ोंमें भिन्न भिन्न तरल पदार्थोंके रखनेसे भिन्न भिन्नही आकारोंमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है परंतु वे सब सूर्य नहीं और सब सूर्यही हैं। अज्ञानीको आवरणके कारण भेद दृष्टि है ज्ञानीको नहीं
प्रश्न--एकसे अनेक एवं अनेकका एक, एकसे अनेक और अनेकसे एक किस प्रकार दृष्टि आता है।
उत्तर--एकसे अनेक इस प्रकार हुआ; जैसे एक शीशमहल हो उसमें सहस्रों काँचके ढ़ फानूस और ग्लास लटक रहे हों, उसमेंसे एक बत्ती जलाई जाय तो सहस्रों बत्तियाँ जलती हुई देख पड़ेंगी अनेकसे एक इस प्रकार हुआ कि, एक बत्तीको बुझा दो सब बत्तियाँ बुझ जायँगी, केवल उस बत्तीका गुप्त अलख स्वरूप रह जायगा शेष कुछ न रहेगा।
२६ प्रश्न--ज्ञानीके लक्षण क्या हैं ?
उत्तर--ज्ञानीका परख ज्ञानीही कर सकता है। दूसरेको नहीं मालूम हो सकती, जो स्वयं ज्ञानी है वह ज्ञानीके भेदको जानता है। बाहिरकी सामग्रीसे ज्ञानीकी पहँचान होना कठिन है।
२७ प्रश्न-परमाणुमें राज्य--आपने कहा था कि, राजा इन्द्रने एक