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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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करे अपनेको सत्गुरुकी कृपा योग्य बनावे । सेवा और भक्ति बिना सत्गुरुकी दया नहीं हो सकती । इस कारण सत्गुरुके दर्शनको, साधुके मिलनेको, सत्संगको जब जाना हो तब कुछ न कुछ भेंट ले जाना चाहिये द्रव्य नाज बस्त्र अथवा कोई दूसरा पदार्थ अवश्य कुछ न कुछ लेकरही साधुके दर्शनको जाना चाहिये । रीते हाथ जाना उचित नहीं । यदि दरिद्र है तो चार दातन अथवा फलही लेकर जावे । सन्त सेवाका सदा ध्यान रखे । संतोंमें किसी प्रकारकी भेददृष्टि न करे, तबही संत और गुरुकी दयाका पात्र हो सकता है । खाली जाकर हाथ केवल संतगुरुसे बकबक करके व्यर्थ समय नष्ट करता है सेवा नहीं करता वह नारकी है ।

इतिहासोंसे प्रमाणित होता है कि, पूर्वकालमें इसाइयोंमें भी भजन और तपादि ईश्वर संबंधी कार्योंकी उत्तम उत्तम रीतियाँ थीं । हिन्दू और मुसलमान सन्तोंके समान उनको भी ज्ञान प्रकाश प्राप्त होता था, जबसे ईसाई लोगोंने सन्तों की निन्दा करनी आरम्भ कर दी, तबसे ईश्वरका नाम स्मरण जप ध्यान आदि सब प्रकारका भजन छूट गया भजन भक्तिका तो नाम भी न रहा । यही कारण है कि, इसाइयोकी बुद्धि संसार विमुख होगई, ईश्वरसे इतनी विरोधता करने लगी कि, उसका नाम लेना भी निरर्थक समझने लगे ।

जबसे सन्तोंका अभाव हुआ तबसे गृहस्थोंसे दान पुण्य और उदारता नष्ट होगई । वर्तमानमें ईसाइयोंके धर्म गुरु लोग जो पादरी नामसे पहचाने जाते हैं भजनसे रहित विषय वासनामें लुब्ध हो रहे हैं । वर्तमान कालके लोगोंकी बुद्धि ऐसी स्थूल हो रही है कि, यदि समझाने पर भी नहीं समझते । सब अपने हानि लाभसे अज्ञात हैं, जो मन कहता है उसीके ऊपर चलकर अपना सर्व नाश करते हैं । ईश्वरका भय और धर्मानुरागका तो नाम भी बाकी नहीं रहा है ।

वर्तमानके लोग (भारतवासी) अङ्गरेजी शिक्षा पाकर भक्ति और धर्म श्रद्धासे ऐसे हीन होगये कि, साधु सन्तों तथा धर्मज्ञ सज्जनोंको देखकर नमस्कार तक नहीं करते । कोट, बूट, सूटके अभिमानमें ऐसे घमण्डसे चलते हैं मानों आजही बिलायतसे आये हैं । जो लोग धर्मादामें विद्या पढ़ते हैं सकारि शिक्षकों को वेतन देती है मूषतमें विद्या प्रदान करती है, ऐसी गुरुभक्ति और सेवाहीन विद्या प्राप्त करनेवाले गुरुकी प्रतिष्ठा और सेवा भक्ति कब कर सकते हैं ?

यदि भारतवासी अपनी गई हुई सुखमय अवस्थाको प्राप्त करना चाहते हैं तो उचित है कि, प्रत्येक पिता अपने २ बंशोंको प्रथम धर्मशिक्षा दें । गुरु, साधु, सन्त और श्रेष्ठोंकी सेवा भक्ति सिखलावें । पीछे दूसरी लौकिक और पारलौकिक विद्या सिखलावें ।