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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

by कबीर साहेब

Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished1,367 pages

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मुहम्मदी धर्मकी प्रशंसा कर रहे थे, उस समय एक ब्राह्मण कह उठा कि, हिन्दू धर्म (आर्य धर्म) इस्लाम धर्मसे कम नहीं बरन् तुल्य है। उसकी इतनीही बातपर काजी और मुल्ताओंने शाह सिकन्दरके निकट जाकर नालिश की। सिकन्दरने तत्कालही ब्राह्मणके बधकी आज्ञा दी। जिस समय ब्राह्मणका बध होने लगा दयालू मुसलमान फकीरने कहा कि, निरपराध प्रजापर अत्याचार न करना चाहिये। इस बातपर फकीरके ऊपर बादशाह बहुत क्रोधित हुआ, ब्राह्मणको कतल करवा दिया। फकीरसे कहा कि, बुतपरस्तकी सिफारिश मत किया कर।

गुरुपदके योग्य — धन्य है उस सच्चे सद्गुरु जिसके मिलनेसे ऐसा धर्म-द्वेषी मनुष्य नम्र हो गया, उसकी कठोरता नष्ट होगई। सब श्रेष्ठता और प्रशंसा उसी सद्गुरुसे है मनुष्यके अभिमानको नष्ट करके अधीनता और नम्रता प्राप्त करानेवाला दूसरा कोई नहीं। उसीकी शिक्षासे सब गुरुपदके योग्य होते हैं।

ईश्वरार्पण दान — संसारी पुरुषोंको उचित है कि, अपनी कमाईमेंसे कुछ अंश दानपुण्यमें खर्च करे तथा संत और गुरुकी सेवामें अर्पण करे जो ऐसा नहीं करता है वह कारूनके समान नर्कका भागी होता है।

जिस प्रकार प्रजा राज्यका कर न चुकावे तो वह अवश्य राजाके कोधानल का ईंधन बनेगी कारागारका कण्ट सहेगी इसी प्रकार जो ईश्वरार्पण दान पुण्य नहीं करता वह अवश्य ईश्वरका अपराधी हो नर्कका भागी बनता है। जिस प्रकार राज्यके सिपाही कर वसूल करनेके लिये प्रजाके पास जाते हैं उसी प्रकार साधु, संत, दुःखी, लाचार; ईश्वरके सेवक मनुष्योंसे ईश्वरी कर लेने आते हैं। राज्यके सेवकोंको प्रजाप्रतिष्ठाके साथ अधीनतासे कर दे देती है तो सुखपूर्वक अपना व्यवहार चला सकती है नहीं तो अड़चन होगी। उसी प्रकार ईश्वरी सेवक संत और साधु जब गृहस्थोंके निकट जावें तो उन्हें उचित है कि, उनको सत्कार पूर्वक अपनी शक्ति अनुसार जो कुछ ईश्वरार्पण देना हो सो दे, यदि ऐसा न करेगा तो ईश्वरी कोपका अधिकारी होगा।


१ कारूनका हाल—मुसलमानी किताबोंमें लिखा है कि, उसके पास इतना धन था कि चालीस गज लम्बी, चालीस गज चौड़ी एवं इतनीही ऊँची, चालीस कोठनिर्या उसके खजानेकी कुञ्जियोंसे भरी हुई थीं, पर वह ऐसा कृपण था कि, कभी भी एक पैसा किसीको नहीं देता था। मूस़ा पैगम्बरने उसे बहुत उपदेश किया पर उसने कुछ भी न सुना। अन्तमें वह अपने द्रव्योंको शिरपर लिये हुये पातालमें धँसने लगा। ऐसा कहते हैं कि, वह वैसाही अव तक पृथ्वीमें धसता चला जाता है। क्यामतके रोज पातालमें गिरेगा उसके द्रव्योंके शब्दसे संसारभरमें लोग चकित होंगे। चाहे जैसी असम्भव और दंतकथा हो पर उसका सार यही है कि, कृपण पुरुषको आदि अन्त और मध्यमें सर्वदा दुःखही रहता है उसका जीवन कभी सुखसे नहीं बीतता, चिंता भय और शोक तो उसके सदाकेही साथी हैं।