कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextपरधर्म और विद्यामें श्रद्धा रखनेसे हानि।
फारसीके पढ़नेमें यह भी रीति है कि, प्रथम बिसमिल्लाह पढ़ाते हैं पर अंगरेजी पढ़नेमें तो बसभिल्लाही नदारद है।
<!-- image: A decorative flourish or calligraphic mark. -->जिस विद्या अथवा व्यवहारमें प्रथम ईश्वरका नाम न लिया जावे उस विद्या और व्यवहारसे अंतःकरणमें अन्धकार फैलता है। आजकल अंग्रेजी राज्यमें कोई भी ऐसा नहीं वर्तमानके विद्या जाननेवालोंमें जो ईश्वरका नाम लेकर कोई पुस्तक अथवा काम आरम्भ करता हो। आजकल किसी पुस्तकके माथा (होर्डिंग) पर कभी भी ईश्वरका नाम नहीं लिखा जाता यही कारण है कि, ईश्वर नाम विहीन पुस्तकोंसे किसीको ज्ञान नहीं प्राप्त होता। म्लेच्छ विद्या पढ़नेसे सबकी बुद्धि भ्रष्ट होगई। प्रथमसेही आजकलकी अवस्थाको जानकर सन्तोंने पहिलेहीसे भविष्यत् कथन कर दिया है कि, कलियुगमें लोगोंकी सत्य बुद्धि नष्ट हो जावेगी।
नानक शाह वचन।
“क्षत्रियोंने धरम छोडे म्लेच्छ भाषा गही सृष्टि सब एक बरन हुई।”
उचित कर्तव्य।
इस लिये उचित है कि, प्रथम धर्मकी शिक्षा देकर तब दूसरा कुछ सिखावें, प्रथम परमेश्वरका नाम लें पीछे, किसी कामको आरम्भ करें।
कितने लोग ऐसे कहा करते हैं कि, जिन सन्तोंका वर्णन शास्त्रों और ग्रन्थोंमें लिखा है, वैसे संत अब कहाँ हैं? पर यह नहीं समझते कि, संत और ईश्वरका कभी अभाव नहीं होता। जब कोई विशेष कारण उपस्थित होता है तो सन्त प्रगट होते हैं अपना काम करके गुप्त हो जाते हैं।
कथा—एक राजा बड़ा अभिमानी था, अपनेसे सबको तुच्छ समझता था। एक दिन आखेटको चला। अच्छे २ घोड़े और उत्तम २ वस्त्र मँगवाकर पहने कुछ सेना साथ लेकर रवाना हुआ। चलते २ एक मंदानमें पहुँचा। वहाँ मंले कपडे पहने हुये एक दरिद्री मनुष्य मिला प्रणाम करके दुःखीरूप मनुष्यने कहा कि, यदि आज्ञा दो तो कुछ विनय किया चाहता हूँ राजाने आज्ञा दी। उसने कहा कि, मैं केवल तुम्हारेही कानमें कहूँगा। राजाने इस बातको भी स्वीकार किया। जब उपरोक्त मनुष्यने राजाके कानमें आकर कहा कि, मैं यमदूत हूँ तुम्हारा प्राण निकालने आया हूँ। इतना सुनते ही तो राजाका चेहरा पीला पड़ गया। यमदूतसे कहा कि, मुझे अपने परिवारोंसे तो मिललने दो।