कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
by कबीर साहेब
Source: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextसन्तोंकोही है। विद्याभिमानी लोग बिलकुल बेसुध हैं। ये सब बातें भजन और विचारके साथ सम्बन्ध रखते हैं। पांच अहङ्कार और छः प्रकारके देहके गुप्त भेदोंकी सुधि अभिमानियों और नास्तिकोंको नहीं मिल सकती, कौन ऐसा सांसारिक है ? जो अद्वैतकी बात जानता है, क्योंकि, सांसारिक सब लोग तो भेदकी बातेंही करते हैं।
सच्चे सन्त ज्ञानी निष्काम लोग जब भेदकी बातें समझते हैं तो विद्याभिमानी लोग उनसे कहते हैं कि, कुछ आँखसे दिखलाओ तभी इन बातोंपर विश्वास हो। वे बातें इस प्रकार हैं जैसे कि, कोई जन्मका अन्धा कहे कि, सूर्य और चन्द्रमा नहीं है, यद्यपि सूर्य और चन्द्रका देखना आँखका काम है आँख ही उसके नहीं है तो किस प्रकार देख सकेगा ? इसी प्रकार जो विद्याभिमानी लोग शुद्ध विचार और विवेकसे शून्य हैं वे ईश्वरी गुप्त भेदोंको किस प्रकार जान सकेंगे ? यह तो विचारवान् विवेकी शुद्ध और सरल हृदयके सन्तोंकाही भाग है। यही कारण है कि, सच्चे सन्तों और विद्याभिमानियोंमें, सर्वदासे विरोध चला आता है, विद्याभिमानियोंकी सङ्गति, भजन छुड़ा देती है। सब सन्तोंका इस बातपर एक मत है कि, प्राकृतिक विद्याभिमानी मनुष्योंसे अलग रहो। अतएव हजरत मसीह फरमाते हैं कि, मरकसकी इञ्जील १२ बाब २८ आयत—फकी हों (कर्मकाण्डके उपदेश करनेवालों) से हुशियार रहो, जो कि, लम्बे जामें पहनकर बाजारोंमें सलामोंकोइबादत् खानोंमें उच्च आसन और ज्याफतोंमें सबसे ऊँची जगहोंको चाहते हैं।
जीवधारी अपने मुंहसे खाते हैं उनके सब अङ्गोंमें रस पहुँचता है, यदि वे नाक, कान आदि किसी दूसरी इन्द्रियोंसे खावें तो नहीं खा सकते, वरन् अस्वस्थ हो जायेंगे इसी प्रकार सच्चे सन्त और सत्यगुरुकी सेवा आज्ञाकारितासे भुक्ति मुक्ति और ज्ञान आदिककी प्राप्ति होती है। यह गुण विद्याभिमानियोंमें नहीं है। क्योंकि, वे तो अपनी बुद्धिके अहङ्कारमें ऐसे डूबे होते हैं कि, उन्हें तो सत्य असत्यका यथार्थ ज्ञान नहीं हो सकता, यही विचार कर सन्तोंने, उनको उपदेश देना छोड़ दिया है इसी विषयपर कबीर साहिबने कहा है कि—
इल्म पढ़ाकर अमल न कीता । सीखा बहुतक हिल्ला ॥
उमरांवाके मजलिस बैठें । लुकमें खॉय सकिल्ला ॥
चिकनी बातें बहुत बनावें । आन हूदीस दलिल्ला ॥
बगला हंसके रूप बनाये । कुल ईमान बिलिल्ला ॥